उत्तराखण्ड सरकार द्वारा पिछले कई सालों से यही दावे करती आ रही थी कि राज्य को 2025 तक नशा मुक्त राज्य बना दिया जायेगा। राज्य सरकार अपने दावों में कितनी सफल हुई है यह राज्य की आम जनता जानती है। राज्य के तकरीबन सभी जिलों में नशे का कारोबार लगातार जारी है। जिसे समाप्त कराने में शासन—प्रशासन बुरी तरह नाकामयाब रहा है। सोचनीय सवाल यह है कि अपनी लाख कोशिशों के बावजूद शासन—प्रशासन नशे पर लगाम लगाने में कामयाब क्यों नही हो सका। इसका सीधा सा मतलब है कि नशा कारोबारी राज्य के हर जिलों में अपना सिंडीकेड पूरी तरह से खड़ा करने में कामयाब हो चुके है। बीते वर्ष कुमांऊ रेंज में यूपी का एक पुलिसकर्मी भारी मात्रा में स्मैक सहित गिरफ्तार किया गया था। जिसने पूछताछ में बताया था कि बरेली में तैनाती के दौरान उसे पता चला था कि उत्तराखण्ड राज्य में स्मैक की भारी खपत हैं जिसके चलते वह भी नशा तस्करी के सिंडीकेट से जुड़ गया। बात अगर उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून की करें तो यहंा भी तकरीबन हर गली मोहल्लों में नशे का कारोबार पुलिस प्रशासन की नाक के नीचे किया जा रहा है। इसका उदाहरण कुछ रोज पहले रायपुर क्षेत्र के शांति विहार में सामने आया है। जहंा रायपुर थाने से मात्र कुछ मीटर पहले एक बस्ती में नशे के खुलेआम चल रहे कारोबार को बंद कराने क्षेत्र की जनता पहुंच गयी। जिसके बाद पुलिस व प्रशासन के अधिकारी भी जाग उठे और उन्होने नशा कारोबार में शामिल लोगों के घरों के आगे बने पुलोंं को तुड़वा दिया और नशा कारोबारियों को दोबारा ऐसा न करने की सलाह दी। राजधानी में अकेले उस बस्ती में ही नशे का कारोबार नहीं हो रहा है यहंा तकरीबन हर इलाके में नशा सिंडीकेड सक्रिय है। जो युवाओं को अपनी चपेट में ले चुका है। इसी नशावृति के चलते राजधानी देहरादून में आपराधिक मामले बढ़ने की बात कही जा रही है। जिसे रोकने में पुलिस प्रशासन नाकाम साबित हो रहा है। राज्य व राज्य की राजधानी देहरादून में अगर पुलिस प्रशासन को नशावृत्ति रोकनी है तो उसे इस मामले में गहराई से सोचने की जरूरत है। क्योंकि पुलिस जब किसी छुटभ्ौय्ये नशा तस्कर को दबोचती है तो वह अपनी पीठ थपथपाती है जबकि पुलिस को उस छुटभ्ौय्ये नशा तस्कर दबोच कर उसके द्वारा नशा तस्करी के उस सिडीकेट तक पहुंचने की जरूरत है जिसमें बड़े—बड़े मगरमच्छ छिपे हुए है तभी राज्य को नशामुक्त बनाया जाना संभव हो सकेगा।




