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सत्ता का दम्भ

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‘कनक कनकते सौ गुने, मादकता अधिकाय या पाये बौराए जग व पाये बौराए, महान हिंदी कवि बिहारी लाल का यह दोहा हमारे वर्तमान दौर के माननीयों पर अक्षतया सटीक साबित हो रहा है आए दिन हम मंत्रियों विधायकों और मुख्यमंत्री तक की सत्ता की हनक के किस्से देखते सुनते रहते हैं। स्वयं को जो जनसेवक और राष्ट्र भक्त बताने वाले नेता वास्तव में अपने आप को क्या समझते हैं वह कितना भी सोच समझकर तथा धैर्य संयम से काम लेते हो लेकिन फिर भी अनेकों बार सत्ता का दम्भ उनके सर चढ़कर बोलने से उन्हें रोक नहीं पाता है और ऐसा कुछ भी बोल देते हैं कि वह उनकी फजीहत का कारण बनने के साथ उनकी छवि खराब ही कर देता है भले ही कई बार वह इसके लिए क्षमा तक भी मांग लेते हूं लेकिन यह क्षमा भी उनके सम्मान और मानं की रक्षा नहीं कर पाती है। इन दिनों उत्तराखंड के माननीय विधायक सुबोध उनियाल का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें वह टिहरी के क्षेत्र के पोलिंग बूथ पर एक महिला से भिड़ जाते हैं महिला द्वारा उन्हें पोलिंग बूथ के अंदर जाने पर जब रोका जाता है तो वह उक्त महिला के साथ अत्यंत ही अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते दिखते हैं। राज्य आंदोलनकारी महिला भी जब उन्हीं की भाषा में जवाब देती है तो यह तक कह देते हैं कि क्या तेरे बाप की खाते हैं। मंत्री के इस तरह आपा खो देने की इस घटना की अब न सिर्फ चारों तरफ चर्चा हो रही है बल्कि लोगों में इसे लेकर भारी आक्रोश भी देखा जा रहा है। इससे पूर्व भी सदन से लेकर सड़क तक उनके कई किस्से चर्चाओं में रह चुके हैं। खास बात यह है कि इस पंक्ति में वह अकेले नेता नहीं है। मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल को सदन में अपनी एक गलत बयानी के कारण मंत्री पद तक खोना पड़ा था तथा खेद और क्षमा प्रार्थना के साथ ही उन्होंने गलती भी स्वीकार कर ली थी लेकिन इसकी बड़ी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी। एक समय में तत्कालीन सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत को प्रदेश के लोग एक जनता दरबार में अपनी शिकायत लेकर पहुंची एक शिक्षिका के साथ अभद्रता की सारी सीमाएं लांगते हुए देख चुके हैं। इस दौरान वह इस कदर अपना आपा खो बैठे हैं कि सुरक्षा कर्मियों तक को उक्त शिक्षका को पकड़ने और गिरफ्तार करने के आदेश तक दे डाले। इस घटना को लेकर भी उनकी खूब निंदा हुई थी। अभी बीते दिनों ऐसी एक घटना को लेकर माननीय गणेश जोशी से पत्रकारों ने टिकट मिलने न मिलने पर एक सवाल पूछ लिया तो वह कुछ पत्रकारों और टीवी चैनलों को टटपुंिजंया बता कर गलत प्रचार कहने की बात कह गये। तथा अपना खुद ही टिकट रिजर्व करते हुए कहने लागे कि चार बार विधायक रहे चुका हूं। पांचवीं बार भी मसूरी से ही लडूंगा और जीतूंगा भी। पत्रकारों का अपमान करने वाले जोशी को भले ही इसके लिए माफी मांगनी पड़ी हो तब कहीं मामला शांत हुआ, वह इससे पूर्व जिला अधिकारी सविन बंसल के साथ की गयी आपदा काल में कुछ अभद्र भाषा में बात करर्ते देखे गये थे। जिसकी लोगों ने खूब मज्जमत की थी। लेकिन यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। हमारा मानना है कि इसमें माननीयो का कोई दोष नहीं है उस कुर्सी का दोश है जिस पर किस्मत ने उन्हें बैठने का अवसर दिया है। सत्ता की हनक इनके सर पर सवार हो जाए तो कुछ नहीं कहा जा सकता है। इससे किसी का भी बच पाना सच में बहुत मुश्किल होता है। पद और पावर का नशा इनसे जो करा दे ठीक। अभी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस साहब ने बेरोजगारों युवाओं को कॉकरोच बता डाला था जो अब सरकार के लिए सरदर्द बन चुके हैं । खैर छोड़िए जो जस करें तस फल भुगते। बाबा तुलसीदास की इस नसीहत के साथ इस बात को यहीं समाप्त करते हैं।

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