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दिल्ली पहुंची ‘काकरोच’ सेना

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  • जनमुद्दों की लड़ाई को दिया राष्ट्रीय मंच, न कोई बड़ा नेता, न राजनीतिक वंश
  • बिना नेता के आंदोलन ने खींचा ध्यान, जनआंदोलनों की तर्ज पर सभी मुद्दें
  • पारंपरिक राजनीति से मोहभंग के बीच नई तरह की जनभागीदारी का दावा
  • शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के मुद्दे पर दिल्ली में चल रहा अनोखा प्रदर्शन

देहरादून। सोशल मीडिया से जन्मी कांकरोच जनता पार्टी अब देश की राजधानी दिल्ली पहुंच गई है। अपने अनोखे नाम और पारंपरिक राजनीति से अलग अंदाज के कारण चर्चा में रहने वाला यह संगठन अब जनमुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए दिल्ली पहुंच चुका है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर काकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन देशभर में चर्चा का विषय बन गया है। शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर काकरोच ने सोशल मीडिया से निकलकर सड़कों तक अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है।
बता दें कि कुछ ही दिनों पहले तक काकरोच जनता पार्टी को इंटरनेट पर एक व्यंग्य और मजाक के रूप में देखा जा रहा था वह अब लाखों युवाओं के समर्थन के साथ एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक अभियान का रूप लेता दिखाई दे रहा है। काकरोच जनता पार्टी की शुरुआत उस समय हुई जब सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान सीजेआई द्वारा कुछ युवाओं को लेकर की गई टिप्पणी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। इसके बाद अभिजित दिपके ने व्यंग्यात्मक अंदाज में काकरोच जनता पार्टी नाम से अभियान शुरू किया। देखते ही देखते इसके सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर करोड़ों फालोअर्स जुड़ गए और अब यह शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों को लेकर खुलकर आवाज उठा रहा है। हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि काकरोच जनता पार्टी भविष्य में चुनावी राजनीति में कदम रखेगी या नहीं, लेकिन भारतीय राजनीति के इतिहास में कई बड़े राजनीतिक दल जन आंदोलनों से ही जन्मे और बाद में सत्ता तक पहुंचे।
ज्ञात हो कि लोकतंत्र में सत्ता की सबसे बड़ी ताकत जनता होती है। इतिहास बताता है कि जब जनता अपने मुद्दों के लिए संगठित होकर आवाज उठाती है, तो सत्ता को उसकी बात सुननी पड़ती है। यही कारण है कि जनमुद्दों पर खड़े हुए आंदोलन केवल विरोध का माध्यम नहीं होते, बल्कि वह राजनीतिक बदलाव की नई इबारत भी लिखते हैं। डिजिटल प्लेटफार्म से बनी कांकरोच जनता पार्टी का आंदोलन पहले सोशल मीडिया पर चल रहा था जो अब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सड़कों तक पहुंच गया है। किसी बड़े चेहरे, स्थापित नेता या राजनीतिक परिवार के बिना चल रहा यह आंदोलन अपने अनोखे नाम और पारंपरिक राजनीति के खिलाफ मुखर तेवरों के कारण चर्चा का विषय बना हुआ है। दिल्ली में कांकरोच जनता पार्टी के बैनर तले जुटे कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने दावा किया कि उनका संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि उन मुद्दों के लिए है जिन्हें मुख्यधारा की राजनीति लगातार नजरअंदाज करती रही है।
आज के बदलते दौर में सोशल मीडिया पर आमजन का जमावड़ा इतिहास बदलने की ओर अग्रसर है। दिल्ली में आयोजित प्रदर्शन यह साबित करने के लिए काफी है। कांकरोच जनता पार्टी के समर्थक अपने आंदोलन की उन आंदोलनों से कर रहे है जो किसी एक नेता की नहीं थी, बल्कि जनभावनाओं और जनसहभागिता का परिणाम थी। उस दौर में गांव-गांव से लोग बिना किसी राजनीतिक लाभ की अपेक्षा के सड़कों पर उतरे थे। आज कांकरोच आंदोलन भी उसी भावना को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। युवाओं के बीच पारंपरिक दलों के प्रति असंतोष नई तरह की राजनीतिक अभिव्यक्तियों को जन्म दे रहा है।


कांकरोच जनता पार्टी का दावा

कांकरोच जनता पार्टी से जुडे़ युवाओं का दावा है कि उसका आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष या राजनीतिक महत्वाकांक्षा का आंदोलन नहीं, बल्कि उन लोगों की आवाज है जो वर्षों से अपनी समस्याओं के समाधान का इंतजार कर रहे हैं। संगठन का मानना है कि जब तक जनमुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा, तब तक उन पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाएगा। इसी सोच के साथ कांकरोच जनता पार्टी ने राजधानी दिल्ली में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। प्रदर्शन के दौरान युवाओं ने रोजगार, पलायन और बढ़ती आर्थिक असमानता के मुद्दों को जोरदार ढंग से उठाया। कांकरोच जनता पार्टी की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जा रही है कि यह किसी एक बड़े नेता के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। संगठन अपने आप को जनआधारित मंच बताता है, जहां मुद्दों को व्यक्ति से ऊपर रखा जाता है। यही कारण है कि दिल्ली में भी संगठन ने किसी बड़े राजनीतिक चेहरे को आगे करने के बजाय सामूहिक नेतृत्व का संदेश देने का प्रयास किया। दिल्ली की सड़कों पर गूंजे इस आंदोलन ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या भारतीय राजनीति में मुद्दों पर आधारित नए जनआंदोलनों के लिए जगह बन रही है, या फिर यह भी समय के साथ एक प्रतीकात्मक पहल बनकर रह जाएगा।

आंदोलनों ने राजनीतिक व्यवस्था को बदला

उत्तराखंड राज्य आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 1990 के दशक में पहाड़ के लोगों ने अलग राज्य की मांग को लेकर लंबा संघर्ष किया। इस आंदोलन का कोई एक सर्वमान्य नेता नहीं था, बल्कि गांव-गांव से उठी जनभावनाओं ने इसे शक्ति दी। महिलाओं, युवाओं, कर्मचारियों और छात्रों ने आंदोलन को जनआंदोलन बनाया। अंततः केंद्र सरकार को झुकना पड़ा और वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ। इस आंदोलन ने न केवल एक नया राज्य बनाया बल्कि उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति के समीकरण भी बदल दिए।
इसके साथ ही 1974 में शुरू हुआ संपूर्ण क्रांति आंदोलन भी जनशक्ति की ताकत का बड़ा उदाहरण है। महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गया। आंदोलन के प्रभाव ने तत्कालीन केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। इसके बाद देश ने आपातकाल और फिर सत्ता परिवर्तन का दौर देखा। यह भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े राजनीतिक बदलावों में गिना जाता है।
2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ चला आंदोलन भी जनभावनाओं की ताकत का उदाहरण बना। दिल्ली के रामलीला मैदान से उठी आवाज पूरे देश में गूंजी। लाखों लोगों ने इसमें भागीदारी की। इस आंदोलन ने न केवल भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाया बल्कि देश में नई राजनीतिक शक्तियों के उभरने का रास्ता भी तैयार किया। हाल के वर्षों में किसान आंदोलन ने भी यह साबित किया कि संगठित जनदबाव सरकारों को अपने फैसले बदलने के लिए मजबूर कर सकता है। लंबे आंदोलन और लगातार जनसमर्थन के बाद केंद्र सरकार को कृषि कानून वापस लेने पड़े। यह लोकतंत्र में जनशक्ति की प्रभावशीलता का ताजा उदाहरण माना जाता है।

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