- सत्ता की हैट्रिक लगाने की तैयारी में भाजपा, वापसी के लिए कांग्रेस का संघर्ष
- यात्राओं, नारों और शक्ति प्रदर्शन के बीच चुनावी बिसात बिछाने में जुट गए दल
- उत्तराखंड में सत्ता के गलियारों से निकलकर राजनीति अब पहुंच गई सड़कों पर
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की घोषणा में अभी वक्त है, लेकिन सियासी रणभेरी बज चुकी है। सत्ता के गलियारों से निकलकर राजनीति अब सड़कों पर पहुंच गई है। भाजपा और कांग्रेस के बीच टकराव अब केवल बयानों, प्रेसवार्ताओं और सदन की बहस तक सीमित नहीं रहा। दोनों दल जनता के बीच उतरकर अपनी ताकत दिखाने और विरोधी की घेराबंदी करने में जुट गए हैं।
वर्ष 2027 का विधानसभा चुनाव भले ही अभी कुछ महीने दूर हो, लेकिन दोनों प्रमुख दलों के लिए राजनीतिक तैयारी का यह समय बेहद अहम है। भाजपा के सामने सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी कर इतिहास रचने की चुनौती है, तो कांग्रेस के सामने सत्ता परिवर्तन की परंपरा को फिर से अपने पक्ष में करने और दस साल के अंतराल के बाद सरकार में लौटने का अवसर। इसीलिए सड़कों पर उतरने की यह कवायद केवल विरोध या समर्थन का प्रदर्शन नहीं, बल्कि चुनाव से पहले जनता की नब्ज टटोलने और राजनीतिक माहौल अपने अनुकूल बनाने की लड़ाई भी है।
उत्तराखंड की राजनीति में भाजपा इस समय सत्ता में है और उसका लक्ष्य वर्ष 2027 में लगातार तीसरी बार सरकार बनाना है। वर्ष 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में जीत के बाद पार्टी के सामने अब अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की बड़ी चुनौती है। भाजपा के लिए यह चुनाव केवल सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह नहीं होगा, बल्कि संगठन की ताकत, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रभाव की भी परीक्षा होगा। भाजपा का भरोसा अपने मजबूत संगठनात्मक ढांचे, बूथ स्तर तक फैले कार्यकर्ता नेटवर्क और केंद्र तथा राज्य सरकार की योजनाओं पर है। पार्टी विकास कार्यों, सड़क और बुनियादी ढांचे के विस्तार, धार्मिक पर्यटन तथा निवेश से जुड़े प्रयासों को जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है।
कांग्रेस के लिए वर्ष 2027 का चुनाव अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता साबित करने का अवसर है। वर्ष 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में हार के बाद पार्टी सत्ता से बाहर है। अब उसे भाजपा को चुनौती देने के साथ यह भी साबित करना है कि वह एकजुट होकर चुनाव लड़ने और सरकार चलाने का भरोसा पैदा कर सकती है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल संगठनात्मक एकजुटता का है। प्रदेश में उसके पास अनुभवी नेताओं की कमी नहीं है, लेकिन इन नेताओं की राजनीतिक सक्रियता को एक साझा चुनावी रणनीति में बदलना जरूरी होगा। गुटबाजी, नेतृत्व को लेकर खींचतान और टिकटों की दावेदारी जैसे सवाल चुनाव नजदीक आने पर पार्टी के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं।
चुनाव से पहले दोनों दलों के वरिष्ठ नेताओं की सक्रियता बढ़ना स्वाभाविक है। भाजपा संगठन को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं को चुनाव के लिए तैयार करने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने पर जोर दे रही है। कांग्रेस भी अपने संगठन को सक्रिय करने, जनसभाओं और यात्राओं के माध्यम से सरकार को घेरने तथा कार्यकर्ताओं में चुनावी ऊर्जा भरने की कोशिश कर रही है। आने वाले दिनों में राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने के आसार हैं। एक दल का आरोप दूसरे दल के लिए जवाबी हमले का आधार बनेगा। स्थानीय स्तर पर नेताओं की सक्रियता, क्षेत्रीय समीकरण और संभावित उम्मीदवारों की दावेदारी भी राजनीतिक सरगर्मी बढ़ाएगी।
सड़कों पर शुरू हुआ यह सियासी संघर्ष अभी शुरुआती दौर में है। चुनाव की तारीख घोषित होने से पहले दोनों दल अपने समर्थकों को सक्रिय करने, विरोधियों की रणनीति का जवाब देने और जनता के बीच अपनी छवि मजबूत करने की कोशिश करेंगे। लेकिन राजनीतिक यात्राओं, नारों और शक्ति प्रदर्शन से आगे बढ़कर जनता के वास्तविक सवालों का जवाब देना ही उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी। युवाओं को रोजगार, पहाड़ों में पलायन पर रोक, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, महिलाओं की सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में आते हैं या नहीं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
उत्तराखंड की 2027 की चुनावी जंग का पहला दौर सड़कों पर शुरू हो चुका है। भाजपा के लिए यह सत्ता की हैट्रिक का रास्ता तैयार करने की लड़ाई है, जबकि कांग्रेस के लिए सत्ता में वापसी की उम्मीदों को जमीन पर उतारने का मौका। दोनों दलों ने अपने राजनीतिक हथियार निकाल लिए हैं। अब मुकाबला इस बात का होगा कि कौन अपने नारों को जनता के भरोसे में और अपने शक्ति प्रदर्शन को वोटों में बदल पाता है।





