खतरे की घंटी

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देश के सत्ता शीर्ष पर बैठे नेताओं का कहना है की सुप्रीम कोर्ट कोई हेड मास्टर नहीं है जो सरकार के कामों में दखल दे या राष्ट्रपति को निर्देश दे कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं करना है। वहीं अब निर्वाचन आयोग द्वारा भी सुप्रीम कोर्ट को यह चुनौती दी गई है कि उसे आयोग के काम में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है क्योंकि निर्वाचन आयोग कोई सरकारी संस्था नहीं है वह स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। बात भले ही कोई नई न सही लेकिन यह सब कुछ जो बीते कुछ सालों से देश की राजनीति में होता दिख रहा है वह देश के लोकतंत्र और संविधान के लिए एक ऐसे गंभीर खतरे का संकेत है कि जो इस देश की राजनीतिक ही नहीं समाज में भी भारी उथल—पुथल पैदा कर सकता है। कार्यपालिका व न्यायपालिका के बीच अधिकारों के वर्चस्व और सर्वोच्ता की इस पुरानी जंग में देश की वह तमाम संवैधानिक व स्वतंत्र संस्थाएं भी शामिल हो गई है जिनके कंधों पर लोकतंत्र को बचाने और कानून व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेवारी है। आप और हम सभी देश के लोग जिस न्यायपालिका के बारे में हमेशा से यह सोच रखते थे कि अगर हमारे साथ किसी भी स्तर पर कहीं भी कभी भी नाइंसाफी होगी तो न्यायपालिका का दरवाजा हमें इंसाफ जरूर दिलाएगा। लेकिन देश के नेताओं द्वारा अगर सुप्रीम कोर्ट को सुप्रीम कोस बताने और देश को सांप्रदायिक हिंसा की आग और गृहयुद्ध में झोंकने के आरोप लगाए जा रहे है तथा सब चुपचाप तमाशबीन बने रहे व कहीं से भी इसके विरुद्ध कोई भी आवाज न उठे तो इसे शुभ संकेत नहीं माना जा सकता है। न्यायालय के किसी भी आदेश की अवमानना करने से भले ही कोर्ट में अवमानना का मुकदमा दर्ज हो सकता हो लेकिन सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ भद्दी से भद्दी टिप्पणी व आरोपो के बाद भी सब चुप्पी साधें रखे तो इसका वह नतीजा होना स्वाभाविक ही है जो आज वर्तमान में हम देख रहे हैं। अगर आज चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट को चुनौती दे रहा है तो कल ईडी और सीबीआई जैसी संस्थाएं भी इसका अनुसरण करेगी। निर्वाचन आयोग में बैठे अधिकारियों में इतनी हिम्मत भला कैसे हो गई कि वह देश के सुप्रीम कोर्ट को इस तरह की चुनौती दे सके तो इसका एक ही सीधा जवाब है कि निर्वाचन आयोग को यह ताकत केंद्र की सरकार से ही मिली होगी क्योंकि निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्तियां उसी के द्वारा की जा रही है। सरकार किसी भी आयुक्त को जब चाहे बाहर का रास्ता दिखा सकती है क्योंकि इन आयुक्तों की तो बिसात ही क्या है जब सरकार ने चंद मिनटों में उपराष्ट्रपति तक से इस्तीफा ले लिया। सत्ता में बैठे लोगों ने बीते समय में कानूनों में कुछ संशोधनों के जरिए तमाम संवैधानिक संस्थाओं पर अपना प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कब्जा किया जा चुका है भले ही हम सुप्रीम कोर्ट के कंधों पर अब देश के संविधान और लोकतंत्र बचाने की जिम्मेदारी डाल रहे हो लेकिन अब खेल इतना ज्यादा खराब हो चुका है कि सुप्रीम कोर्ट के लिए भी यह एक गंभीर चुनौती बन चुका है। इस देश में अगर समाज और लोकतंत्र व संविधान का भविष्य जो दांव पर लग चुका है उसका हश्र कल क्या होगा यह कोई नहीं जानता।

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