उत्तराखंड में होने वाले पंचायत चुनाव को लेकर सत्ता पक्ष कितना गंभीर है इस बात को सभी जानते हैं। चुनाव के समय पर न होना तथा पंचायत को प्रशासकों के हवाले किया जाना और आरक्षण रोटेशन से जुड़ी समस्याओं का अनसुलझा रहने से अब मानसूनी आपदा काल में इन चुनावों को कराया जाना सरकार द्वारा सरकारी तंत्र की संवेदनशीलता को बताने के लिए काफी है। राज्य में पंचायती चुनाव को लेकर भले ही चुनावी प्रक्रिया गतिमान हो और नामांकन और नाम वापसी तक पहुंच चुका हो लेकिन पंचायत चुनाव अभी भी होंगे या नहीं होंगे यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है। एक ओर इन चुनावों को राज्य की विषम परिस्थितियों और मानसूनी आपदा का हवाला देकर सामाजिक कार्यकर्ता तथा कुछ आरटीआई एक्टिविस्ट हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ बिना जांच के अपने नामांकन पत्रों का खारिज किये जाने की शिकायत को लेकर प्रत्याशियों के द्वारा भी हाईकोर्ट में आपत्तियां दर्ज कराई जा रही हैं। बीते कल तक ऐसे कई लोग हाई कोर्ट पहुंच चुके हैं जिन्होंने अपने रिटर्निंग अधिकारी द्वारा बिना जांच नामांकन पत्र को खारिज करने के आरोप लगाए गए हैं यह सिलसिला अभी जारी है। जो मामले हाईकोर्ट में पहुंच रहे हैं उन्हें आप निराधार भी नहीं ठहरा सकते हैं। जब स्थिति इस तरह की हो कि किसी ग्राम पंचायत में जिस वर्ग की सीट आरक्षित की गई हो और उसे वर्ग का कोई प्रत्याशी न हो जिसके कारण नामांकन भरा ही न जाए तो इसे क्या कहा जा सकता है। उत्तराखंड के पंचायत चुनाव में एक नहीं अनेक क्षेत्रों से तमाम तरह की शिकायतें मिली है जिनका निराकरण अब ऐसे समय में किया जाना संभव नहीं है जबकि 24 व 28 जुलाई को मतदान होना है। सही मायने में इन चुनावों को लेकर तमाम उलझने और समस्याओं के कारण मतदाताओं में भी उत्साह नहीं दिख रहा है लोगों का मानना है कि इस तरह से चुनाव कराने से तो बेहतर यही होता कि एक बार सरकार प्रशासकों का कार्यकाल और बढ़ा देती। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कावड़ यात्रा और चार धाम यात्रा तथा राज्य में भयंकर मानसूनी बारिश के कारण पूरे राज्य में जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित है राज्य की छोटी बड़ी 180 से भी अधिक सड़के भूस्खलन के कारण बंद पड़ी है बादल फटने की घटनाओं ने बहुत सारे क्षेत्र में तबाही की स्थिति पैदा कर रखी है। शासन प्रशासन इस आपदा काल में कावड़ यात्रा तथा आपदा प्रबंधन में जुटा है। इन चुनावों को किस तरह से सुरक्षित तरीके से संपन्न कराया जा सकेगा? तथा राज्य के ेकितने मतदाताओं द्वारा अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल किया जा सकेगा यह समय ही बताया। लेकिन दूसरी तरफ इस चुनाव में कुछ पढ़े लिखे युवाओं और सेवानिवृत कर्नल तथा आईजी जैसे लोगों द्वारा गांव की छोटी सरकार को चलाने के लिए आगे आना कुछ सुखद भविष्य के संकेत भी देता है। अब देखना यह होगा कि हाई कोर्ट द्वारा इस चुनाव को निर्धारित कार्यक्रम के अनुरूप ही करने का फैसला लिया जाता है या एक बार फिर यह चुनाव पूर्व की तरह स्थगित कर दिया जाता है जैसे कि अभी किया गया जिसके कारण चुनाव आयोग को इसके लिए दोबारा से नई अधिसूचना जारी करनी पड़ी थी।




