लोकतंत्र की असल ताकत उस वोट को माना जाता है जिसका अधिकार देश के हर एक नागरिक को संविधान देता है यदि आम नागरिक से उसके वोट का अधिकार छीन लिया जाए अथवा वह वोट चाहे जिसे भी दे चुनाव में हार जीत उसके वोट से तय ही न हो तब फिर ऐसे लोकतंत्र के कोई मायने रह ही नहीं जाते हैं। समूचे विपक्ष द्वारा बिहार में इसी मुद्दे को लेकर बिहार बंद का आयोजन कल किया गया जिसे वोट बंदी का नाम दिया गया। संक्षेप में समझा जाए तो चुनाव आयोग बिहार के विधानसभा चुनाव से ऐन पूर्व मतदाता सूचियों के पुर्न निरीक्षण का फरमान जारी किया गया जिसमें सभी मतदाताओं से एक फॉर्म भरने को कहा गया है जिसमें उन्हें एक दर्जन प्रमाण पत्र साक्ष्य के रूप में पेश करने होंगे कि वह इस देश और राज्य के मतदाता हैं। इस प्रक्रिया को पूरा कर पाना अधिसंख्यक मतदाताओं के दिए संभव नहीं होगा और जो इस प्रक्रिया को पूरा नहीं करेगा चुनाव आयोग उसका नाम मतदाता सूची से हटा देगा यानी उसका मत का अधिकार ही समाप्त हो जाएगा। इसके विरोध में संपूर्ण बिहार में एक अत्यंत ही प्रभावी बंद देखने को मिला और बड़ी संख्या में लोगों ने सड़कों पर उतरकर चुनाव आयोग तथा केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग सत्ता पक्ष के लिए काम कर रहा है और वह चुनाव की चोरी करवा रहा है। बीते दिनों हरियाणा तथा महाराष्ट्र के चुनावों में चुनाव आयोग ऐसा कर चुका है। विपक्ष का यह भी आरोप है कि हर बार चुनाव के परिणाम अपने पक्ष में मोड़ने के लिए सत्ता पक्ष द्वारा चुनाव आयोग के जरिए एक नया फार्मूला या कहें हथकंडा अपनाया जाता है कभी ईवीएम में धांधली को कभी मतदान के अंतिम चरणों में मतदान प्रतिशत में भारी बढ़ोतरी या कुछ और तरीके अपना कर परिणाम को अपने पक्ष में कर लिया जाता है। सवाल यह है कि कहां तो केंद्र की सरकार द्वारा एक व्यक्ति एक पहचान और एक राष्ट्र एक चुनाव जैसी बातें कही जाती है वहीं दूसरी ओर मतदाता होने के लिए आम लोगों से दर्जनों प्रमाण क्यों मांगे जा रहे हैं? सरकार द्वारा देश के लोगों को जब आधार कार्ड दिया गया था तब उसे पुख्ता पहचान पत्र माना जा रहा था। पासपोर्ट और राशन कार्ड तथा पैन कार्ड आदि—आदि तमाम प्रमाण पत्र मतदाता की पहचान के लिए मान्य होते थे। अब मां और बाप तक के जन्म प्रमाण पत्र एक आदमी कहां से लेकर आए। देश में आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं जिन्हें खुद की सही जन्मतिथि का पता नहीं है क्योंकि पुराने लोग इसकी जरूरत ही नहीं समझते थे। स्कूलों में भर्ती होते समय गुरुजनों द्वारा जो जन्म तिथि रजिस्टर में लिख दी जाती थी वही जन्मतिथि हो जाया करती थी। खैर यह मुद्दा अति संवेदनशील है जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। 2014 के लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक देश में जितने भी छोटे—बड़े चुनाव हुए हैं भाजपा हर बार एक नया मुद्दा लेकर आती रही है। वह भले ही अब 2047 तक देश को विकसित राष्ट्र के शगुफेे तक पहुंच चुका है। काला धन समाप्त करने के लिए नोटबंदी का ऐलान किया गया था लेकिन इससे सारा काला धन ही सफेद हो गया अच्छे दिन आने की बात हो या राष्ट्रभक्ति के दावों की, चुनाव जीतने के लिए प्रयोग में लाए गए तमाम शगूफे शायद अब समाप्त हो चुके हैं यही कारण है कि हेरा फेरी को ही अब चुनाव जीतने का हथियार बनाना सत्ता पक्ष की मजबूरी हो गया है। देखना होगा कि अब सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग इस वोट बंदी के मुद्दे पर क्या कुछ करता है।




