आप अपनी जमीन में जो बोएंगे वही काटेंगे ट्टबोया पेड़ बबूल का आम कहां से आए’ यह सिर्फ सूक्ति नहीं है। हमारी राष्ट्रीयता और सामाजिक व्यवस्था की यथार्थ फिलासफी है। जिस नफरत की राजनीति की चर्चा बीते कुछ दिनों से देश के लोग कर और सुन रहे हैं उसका क्रूर चेहरा अब हमारे सामने आना शुरू हो गया है। बहुत सोचने की जरूरत नहीं है कि देश में नफरत की इस बबूल की बगिया को किसने लगाया और किसने इसमें खाद पानी देकर सरसब्ज बनाया है। लंबे समय से देश में होने वाली धर्म और जाति की राजनीति करने वाले नेता ही इसके लिए जिम्मेवार है। लेकिन देश और राष्ट्रीयता तथा समाज के दिए कभी न सोचने वाले और सिर्फ वोट और सत्ता के लिए धर्म और जाति की राजनीति करने वाले नेताओं को यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि वह और उनके परिवार भी इसी देश और समाज का हिस्सा है इसलिए वह जो बबूल बो रहे हैं उसके कांटे उनकी पीढ़ियो के पांवों को भी लहूलुहान जरूर करेंगे। देश की राजनीति में इन दिनों तीन महिलाओं के नाम की चर्चा है। सोशल मीडिया के जरिए ट्रोलरो के निशाने आने वाली इन तीन महिलाओं में एक उत्तराखंड की श्ौला नेगी भी है। उनका दोष यह है कि उन्होंने नैनीताल में 12 वर्षीय लड़की के साथ रेप की घटना को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रही उस भीड़ का विरोध करने का साहस दिखाया जो विरोध प्रदर्शन की आड़ में निर्दाेष लोगों से मारपीट कर रही थी तथा उनके मकान और दुकानों में तोड़फोड़ कर रही थी। श्ौला नेगी ने भीड़ के इस अमानवीय अनैतिक कार्य को गलत बताया वहीं हिंदू प्रदर्शनकारी अपनी ही हिंदू बेटी श्ौला नेगी को बलात्कार कर जंगल और नहर में फेंकने की धमकियां देने पर उतर आए और श्ौला को मुसलमानों की हिमायती ठहराने लगे। नैनीताल में हुए रेप को हिंदू—मुस्लिम दंगे में तब्दील कर कानून व्यवस्था को हाथ में लेने वाले लोग सही है या फिर इनका विरोध करने वाली श्ौला, इसका फैसला आप तमाम वायरल हो रहे वीडियो को देखकर कर सकते हैं। इसी कड़ी में दूसरा नाम है उस हिमांशी का जिसकी तस्वीर पहलगाम हमले के बाद आतंकियों की गोलियों का शिकार हुए अपने पति के मृत शरीर के पास बैठे पूरे देश ने देखी। हिमांशी ट्रोलरों के निशाने पर इसलिए आई क्योंकि पति की हत्या के बाद उन्होंने निर्दाेष कश्मीरी व मुसलमानों का उत्पीड़न न करने की अपील की। उनकी इस मानवता के लिए उन्हें पाक परस्त या मुसलमानोंं का हमदर्द बताकर भद्दे—बड़े कमेंट किये जा रहे हैं। इस कड़ी में तीसरा नाम है अपना सरनेम बदलने और उसकी जगह ह्यूमनिटी लिखवाने वाली पश्चिम बंगाल की सृजनी का। जिनके बारे में लोग यह ट्रोलर आर्मी न जाने क्या—क्या कह रही है। 12वीं बोर्ड की परीक्षा की टॉपर रही सृजनी ने कोलकाता के नर्सिंग रेप कांड पर देश धार्मिक व सामाजिक असमानता पर सवाल खड़े करने का साहस दिखाया था जो उन लोगों को पसंद नहीं आया जो सिर्फ अपनी बात कहते हैं और जिन्हें सवाल करना पसंद नहीं है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और नारी सशक्तिकरण की बड़ी—बड़ी बात करने वालों को देश की बेटियों की मानवता की बात करना पसंद नहीं आ रहा है नफरती आग ने उन्हें इस कदर अंधा कर दिया है कि अपनी ही बेटियों के लिए कुछ भी कह रहे हैं यह निंदनीय व सोचनीय है।




