October 14, 2026उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ेने वाली है टिकट की जंग दिल्ली से दून तक संगठन में पुराने बनाम नए भाजपाइयों की लड़ाई के आसार भाजपा मीडिया प्रभारी मनवीर चौहान के बयान ने उत्तराखंड में गरमाई सियासत दलबदलुओं के टिकट पर सवाल, सरकार से संगठन तक दायित्वधारियों की लंबी फौज देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी के भीतर टिकट की जंग तेज होने के संकेत मिलने लगे हैं। सत्ता और संगठन में अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे नेताओं के बीच अब दलबदल का मुद्दा भी नए सिरे से गरमाने लगा है। कांग्रेस और दूसरे दलों से भाजपा में आए नेताओं की राजनीतिक हैसियत को लेकर प्रदेश में चल रही चर्चाओं के बीच पार्टी के मीडिया प्रभारी मनवीर सिंह चौहान की टिप्पणी ने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। पशु मेले में लूले-लंगड़े गधे-घोड़े खरीदे जाने जैसे तंज ने उन नेताओं की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जो दूसरे दलों से भाजपा में आए और अब आगामी चुनाव में टिकट की दावेदारी कर रहे हैं।2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और अन्य दलों के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले कई नेता बाद में भाजपा में शामिल हो गए थे। इनमें से अनेक नेता अब अपनी-अपनी विधानसभा सीटों पर सक्रिय हैं और अगले चुनाव में भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। लेकिन भाजपा के भीतर टिकट के दावेदारों की लंबी कतार और पुराने कार्यकर्ताओं की अपनी दावेदारी के बीच इन नेताओं का राजनीतिक भविष्य आसान नजर नहीं आ रहा है। दलबदल कर भाजपा में आए नेताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी में अपनी स्वीकार्यता साबित करने की है। एक तरफ उन्हें अपने पुराने राजनीतिक जनाधार और समर्थकों को साथ बनाए रखना है, तो दूसरी तरफ भाजपा के उन कार्यकर्ताओं के बीच जगह बनानी है, जो वर्षों से संगठन के लिए काम कर रहे हैं और टिकट पर अपना स्वाभाविक दावा मानते हैं।ऐसे में मनवीर सिंह चौहान की टिप्पणी को केवल एक राजनीतिक तंज मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। चुनाव से पहले टिकट की दावेदारी के बीच इस तरह की टिप्पणी दलबदलुओं की स्थिति पर सवाल खड़े करती है। हालांकि, इस बयान से सभी दलबदलुओं के टिकट कटने या पार्टी में उनकी भूमिका खत्म होने का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना साफ है कि टिकट की लड़ाई में पुराने और नए नेताओं के बीच टकराव की आशंका बनी हुई है। भाजपा में टिकट वितरण का फैसला केवल किसी नेता की व्यक्तिगत दावेदारी से तय नहीं होता। संगठन की रणनीति, चुनावी जीत की संभावना, स्थानीय समीकरण और केंद्रीय नेतृत्व का आकलन इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश से लेकर दिल्ली तक नेताओं की सक्रियता बढ़ने के साथ दावेदारों के बीच प्रतिस्पर्धा भी तेज होने लगी है।दूसरे दलों से भाजपा में आए नेताओं को उम्मीद है कि पार्टी में उनकी राजनीतिक उपयोगिता और स्थानीय प्रभाव के आधार पर उन्हें अवसर मिलेगा। वहीं, पुराने कार्यकर्ता यह सवाल उठा सकते हैं कि लंबे समय से संगठन के लिए काम करने के बावजूद टिकट के समय बाहरी नेताओं को प्राथमिकता क्यों दी जाए। यही विरोधाभास आगामी चुनाव में भाजपा के लिए आंतरिक चुनौती बन सकता है।भाजपा की सियासत में केवल विधानसभा टिकट ही दावेदारी का केंद्र नहीं है। सरकार में दायित्व, संगठन में पद और विभिन्न संस्थाओं में नियुक्तियों की उम्मीद लगाए नेताओं की भी लंबी कतार है। ऐसे में चुनाव से पहले पार्टी के सामने सभी महत्वाकांक्षाओं को साधने की चुनौती होगी। जिन नेताओं को टिकट की उम्मीद है, वे अपनी विधानसभा में सक्रियता बढ़ा रहे हैं। जिन्हें संगठन या सरकार में जिम्मेदारी मिलने की आशा है, वह भी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। दलबदलुओं को लेकर सामने आया तंज इस व्यापक प्रतिस्पर्धा के बीच और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।उत्तराखंड में भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में आने का लक्ष्य लेकर चुनावी तैयारी कर रही है। ऐसे में पार्टी के लिए केवल विपक्ष को चुनौती देना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि अपने भीतर टिकट के दावेदारों और अलग-अलग गुटों के बीच संतुलन बनाए रखना भी जरूरी होगा। दलबदलुओं को लेकर उठी बहस आने वाले दिनों में कितना राजनीतिक रूप लेती है, यह पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया और टिकट वितरण की रणनीति से स्पष्ट होगा। फिलहाल सवाल यही है कि दूसरे दलों से भाजपा में आए नेताओं को चुनावी मैदान में उतारकर पार्टी कितना जोखिम लेगी और कितने पुराने कार्यकर्ताओं की दावेदारी को प्राथमिकता देगी।2027 के चुनाव में भाजपा की असली परीक्षा केवल सीटें जीतने की नहीं, बल्कि टिकट की दौड़ में अपने ही नेताओं के बीच पैदा होने वाले असंतोष को संभालने की भी होगी। मनवीर चौहान की टिप्पणी ने इस चुनौती को चुनावी तैयारियों के बीच चर्चा के केंद्र में ला दिया है।