May 20, 2026देहरादून। जिलाधिकारी सविन बसंल ने भीषण गर्मी और लू को ध्यान में रखते हुए आमजन से अपील की है कि दोपहर की तेज धूप से बचें और अनावश्यक घर से बाहर न निकले।जिलाधिकारी सविन बंसल के निर्देश पर जनपद में लगातार बढ़ते तापमान एवं संभावित लू (हीट वेव) की स्थिति को देखते हुए जिला प्रशासन पूर्ण सतर्कता के साथ कार्य कर रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग, देहरादून द्वारा जारी पूर्वानुमान के अनुसार आगामी दिनों में तापमान में 1 से 3 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि होने तथा मैदानी क्षेत्रों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक पहुंचने की संभावना व्यक्त की गई है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी ने सभी विभागों को समन्वित कार्रवाई करते हुए आवश्यक व्यवस्थाएं तत्काल सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। मौसम विभाग के अनुसार देहरादून नगर सहित आसपास के मैदानी क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी रहने तथा जौलीग्रांट एवं डोईवाला क्षेत्रों में तापमान 35 से 40 डिग्री सेल्सियस के मध्य रहने की संभावना है। इसके दृष्टिगत जिला प्रशासन द्वारा स्वास्थ्य, पेयजल, विघुत, नगर निकाय, शिक्षा, श्रम एवं आपदा प्रबंधन सहित सभी संबंधित विभागों को आवश्यक सतर्कता एवं राहत उपाय सुनिश्चित करने के निर्देश जारी किए गए हैं। जिलाधिकारी के निर्देशानुसार जिला आपातकालीन परिचालन केंद्र को 24 घंटे सक्रिय रखा जाएगा।हीट स्ट्रोक एवं डिहाइड्रेशन से प्रभावित मरीजों के उपचार हेतु विशेष चिकित्सा व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश भी दिए गए हैं। नगर निकायों को सार्वजनिक स्थलों, बाजारों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशन एवं प्रमुख चौराहों पर पेयजल, छायादार स्थल एवं वाटर टैंकर की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में अस्थायी शेड एवं विश्राम स्थलों की व्यवस्था विकसित की जाएगी। विघुत विभाग को निर्बाध विघुत आपूर्ति बनाए रखने तथा पेयजल व्यवस्था प्रभावित न होने देने के निर्देश दिए गए हैं। जल संस्थान एवं पेयजल विभाग को नियमित जलापूर्ति सुनिश्चित करने तथा जल संकट वाले क्षेत्रों में अतिरिक्त टैंकर उपलब्ध कराने को कहा गया है। निर्माण स्थलों, औघोगिक इकाइयों एवं बाहरी कार्यस्थलों पर कार्यरत श्रमिकों के हितों को ध्यान में रखते हुए कार्य अवधि को प्रातः एवं सायंकालीन समय तक सीमित रखने के निर्देश जारी किए गए हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों एवं विघालयों में बच्चों के लिए पर्याप्त पेयजल एवं प्राथमिक उपचार व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। जिला प्रशासन द्वारा आशा कार्यकर्ताओं, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं एवं ग्राम पंचायत स्तर के कार्मिकों के माध्यम से बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों एवं गंभीर रोगियों की नियमित निगरानी किए जाने के निर्देश दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त जनसामान्य को लू से बचाव के उपायों के प्रति जागरूक करने हेतु सोशल मीडिया, एफएम रेडियो, स्थानीय समाचार पत्र, मोबाइल मैसेज एवं सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली के माध्यम से नियमित एडवाइजरी जारी की जाएगी। जिलाधिकारी ने सभी विभागों को समन्वय स्थापित करते हुए सतत निगरानी बनाए रखने तथा किसी भी आपात स्थिति से प्रभावी ढंग से निपटने हेतु पूर्ण तत्परता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
May 20, 2026पहाड़ की डांट, दर्द और देसी अनुशासन था कंडाली की छपाक कान्वेंट के दौर में गुम हुआ पहाड़ का वह पारंपरिक अनुशासन कंडाली की छपाक बनाती थी फौलाद, अब बदल गया है समय सजा नहीं थी बल्कि पहाड़ी जीवन के कठोर संस्कारों का हिस्सा देहरादून। पहले पहाड़ में बच्चे की गुस्ताखियों की एक ही सजा होती थी कंडाली की छपाक। आज पहाड़ के गांव खाली हो रहे हैं और जो बच्चे शहरों के कान्वेंट स्कूलों में पढ़ रहे हैं वह बच्चे प्राचीन कंडाली थेरेपी से कोसों दूर हैं। आज की पीढ़ी के लिए अनुशासन का मतलब मोबाइल छीन लेना या इंटरनेट बंद कर देना है। लेकिन जो लोग 80 या 90 के दशक में पहाड़ के सरकारी स्कूलों और खेतों में पले-बढ़े हैं वह जानते हैं कि कंडाली की उस छपाक ने उन्हें कितना मजबूत बनाया।मोबाइल पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल कोठियाल की एक रिपोर्ट देखते समय कंडाली की छपाक शब्द आया। खाना खाते समय बेटी भी साथ में बैठी थी, तो बेटी ने तपाक से पूछ लिया कि पापा यह कंडाली की छपाक क्या है। कुछ देर में खुद सकपका गया। मैं पहाड़ में जन्मा और कई बार कंडाली की छपाक लगी है। बेटी के प्रश्न का जवाब देने के लिए भूमिका बनाई और उसे विस्तार से जानकारी दी। उसी के बाद मन में आया कि आज बच्चे मोबाइल पर हैं कही न कही उन्हें यह आर्टिकल घूम फिर कर मिल ही जाएगा और उन्हें कंडाली की छपाक पर विस्तार से पढ़ने को मिलेगा।बता दें कि उत्तराखंड के गांवों में बचपन कभी केवल खिलौनों और मोबाइल की स्क्रीन में नहीं बीतता था। वहां खेत, जंगल, ढलानें थीं और उन्हीं के बीच जीवन के अपने देसी नियम भी थे और गलती होने परकृकंडाली की छपाक का नियम था। कंडाली यानी बिच्छू घास। पहाड़ के जंगलों और खेतों के किनारों पर उगने वाला यह पौधा जितना साधारण दिखता है, उसका स्पर्श उतना ही तीखा होता है। शरीर पर लगते ही जलन, चुभन और बेचौनी शुरू हो जाती है। लेकिन पहाड़ की पुरानी पीढ़ियों के लिए कंडाली केवल एक पौधा नहीं, बल्कि अनुशासन का देसी हथियार हुआ करती थी।गांवों में जब बच्चे जरूरत से ज्यादा शरारत कर दें, खेतों में नुकसान कर दें, स्कूल से भाग जाएं या बड़ों की बात न मानें, तब कई घरों में डांट के साथ कंडाली की छपाक भी मिलती थी। बुजुर्ग आज भी मुस्कुराते हुए याद करते हैं कि मां या दादी खेत से ताजी कंडाली तोड़ लाती थीं और बस एक हल्की छपाक पूरे शरीर में बिजली-सी दौड़ा देती थी। उस दर्द में आंसू भी होते थे और डर भी। बच्चे घंटों खुजलाते रहते, लेकिन अगले कुछ दिनों तक गलती दोहराने की हिम्मत नहीं होती थी। पहाड़ के कठिन जीवन में यही देसी अनुशासन थाकृन कोई काउंसलिंग, न लंबी समझाइश, बस कंडाली की एक छपाक और सबक तैयार।हालांकि आज के नजरिए से देखें तो यह तरीका कठोर लग सकता है, लेकिन उस दौर के सामाजिक और पारिवारिक जीवन में इसे सामान्य माना जाता था। पहाड़ का जीवन संघर्षों से भरा था। खेत, पशु, पानी और जंगल के बीच जीने वाले परिवारों में बच्चों को जल्दी जिम्मेदार बनाना जरूरी समझा जाता था। शायद इसी वजह से अनुशासन के तरीके भी उतने ही सख्त थे।आज गांव बदल रहे हैं। कच्चे आंगन पक्के हो गए हैं, जंगलों की राहें सूनी पड़ रही हैं और बच्चों के खेल मोबाइल में सिमटते जा रहे हैं। नई पीढ़ी शायद कंडाली की छपाक का मतलब भी ठीक से न समझ पाए। लेकिन पहाड़ के बुजुर्गों की यादों में यह शब्द आज भी एक पूरा बचपन जिंदा कर देता है,कृजहां दर्द भी अपना था और अनुशासन भी देसी। बाक्ससजा, दवा और स्वादविज्ञान और पहाड़ की परंपराएं भी अजीब हैं, जिस कंडाली से बच्चे खौफ खाते हैं, वही कंडाली पहाड़ की सबसे पौष्टिक डिश भी है। सर्दियों में बनने वाला कंडाली का साग या भुज्जी न सिर्फ आयरन और विटामिन से भरपूर होता है, बल्कि यह शरीर को गर्म रखने और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने की अचूक दवा भी है। कंडाली का साग आज भी उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजनों में खास स्थान रखता है। यानी जो पौधा बचपन में सजा देता था, वही बड़े होने पर थाली में स्वाद बनकर लौट आता था।
May 20, 2026देहरादून। ऑनलाईन दवा की बिव्रQी बंद करने सहित अपनी विभिन्न मांगों को लेकर ऑल इंडिया आर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्टस के आहवान पर देश भर में केमिस्ट्स की दुकानें बंद रखकर अपना विरोध व्यक्त किया।आज यहां ऑल इंडिया आर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स के आहवान पर पूरे देश भर में केमिस्ट्स ने हडताल रखकर अपनी दुकानें बंद रखी। उनकी मांग थी कि ऑनलाइन दवा कि बिव्रQी बंद की जाये तथा कॉरपोरेट्स द्वारा भारी डिस्कॉउट दिया जा रहा है इसको भी बंद किया जाये। उन्होंने ई—फार्मेसी का पुरजोर विरोध करते हुए इसको जन स्वास्थ्य और रोगी सुरक्षा के लिए बडा खतरा बताया। उनका कहना था कि ई—फर्मेसी से फर्जी और असत्यापित पर्चे, नशीली दवाओं और एंटीबायोटिक्स तक आसान पहुंच हो जाती है तथा फार्मासिस्ट ओर रोगी के बीच संवाद का अभाव रहता है तथा नकली या अशुद्ध दवाओं का जोखिम रहता है। उनका कहना था कि बडे कॉरपोरेट्स की मनमानी और बाजार बिगडने से अनियमित भारी छूट, छोटे केमिस्टों के अस्तित्व को संकट व पांच करोड की आजीविका प्रभावित हो रही है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि अधिसूचना जीएसआर 220(ई) और जीएसआर 817 (इ) तुरंत वापस लिया जाए तथा अवैध ई—फार्मेसी पर सख्त प्रतिबंध लगाया जाये। सारा दिन केमिस्ट की दुकानों के बंद रहने से मरीजोें व उनके तिमारदारों को काफी परेशानियों का सामना करना पडा।
May 20, 2026एक महिला की मौत, 10 घायल देहरादून। नेहरु कॉलोनी क्षेत्र में एक निजी अस्पताल में आज सुबह आग लगने से जहंा एक महिला की मौत हो गयी वहीं 10 लोग घायल हुए है। सूचना मिलने पर पुलिस ने मौके पर पहुंच कर सभी को बाहर निकालकर दूसरे निजी अस्पताल में पहुंचाया जहंा उनका उपचार जारी है। हालांकि रेस्क्यू के दौरान तीन पुलिसकर्मी भी घायल हुए है। जिन्हे भी अस्पताल में भर्ती कराया गया है।जानकारी के अनुसार आज सुबह कंट्रोल रूम के माध्यम से थाना नेहरू कॉलोनी पुलिस को सूचना मिली कि रिस्पना पुल के पास स्थित पेनिसिया अस्पताल में आग लग गयी है। जिस कारण अंदर मरीज फंंसे हुए है। सूचना पर तत्काल कार्यवाही करते हुए पुलिस बल मौके पर पहुंचा, जहां जानकारी करने पर ज्ञात हुआ कि पेनेशिया अस्पताल के आईसीयू में एसी के ब्लास्ट होने पर उक्त आगजनी की घटना हुई। मौके पर पुलिस द्वारा त्वरित कार्यवाही करते हुए आईसीयू में एडमिट मरीजों को रेस्क्यू कर बाहर निकाला गया। रेस्क्यू के दौरान आईसीयू में गैस व धुँए के कारण कुछ मरीजों एवं पुलिस कर्मियों को भी ऑक्सीजन की कमी होने के कारण उन्हें कैलाश अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उपचार के दौरान पेनेसिया हॉस्पिटल के आईसीयू में पहले से ही वेंटिलेटर पर रखी गई एक बुजुर्ग महिला की मृत्यु हो गई।घटना की सूचना मिलने पर एसएसपी देहरादून तथा एसपी सिटी द्वारा तत्काल मौके पर पहुँचकर उपस्थित अधिकारियों से घटना के संबंध में जानकारियां लेते हुए उन्हें आवश्यक निर्देश दिए गए। इस दौरान एसएसपी देहरादून द्वारा कैलाश अस्पताल में जाकर रेस्क्यू अभियान के दौरान ऑक्सिजन की कमी के चलते भर्ती पुलिसकर्मियों से मुलाकात की गई तथा उनके उपचार में लगे चिकित्सकों से मरीजों/ पुलिस कर्मियों के स्वास्थ्य के संबंध में जानकारी प्राप्त की गई।घटना में 10 व्यक्ति घायल हो गए व 1 बुजुर्ग महिला, जो पहले से ही वेंटिलेटर पर थी, की मृत्यु हो गई तथा राहत एवं बचाव कार्य में लगे 3 पुलिस कर्मियों को भी स्वास्थ्य संबंधित दिक्कतें आयी। घायल व्यक्तियों के नाम राहुल कुमार पुत्र महेंद्र सिंह निवासी गांव बूंद की मिल थाना नगीना नजीबाबाद बिजनौर, मुकेश पुत्र रामपाल निवासी गांव नंदनपुर हिमाचल प्रदेश हिमाचल प्रदेश, शंभू दास पुत्र गिरवानदास निवासी भगवानपुर हरिद्वार, गोरी पुत्री रेनू निवासी चंद्रपुर चंद्रपुर सहारनपुर, दौलत सिंह उम्र लगभग 45 वर्ष पुत्र देव सिंह नेगी निवासी नंदा नगर चमोली, बेबी उर्फ पायल नवजात निवासी अज्ञात, संगीता देवी पता अज्ञात, खान बहादुर पुत्र मुख्तियार निवासी मंगलौर हरिद्वार, नित्यानंद पुत्र सोमपाल निवासी भगवानपुर हरिद्वार व निहाल पुत्र घसीटा निवासी नेहटौर, जिला बिजनोर,(कोरोनेशन अस्पताल में भर्ती) है। वहंीं मृतक महिला की पहचान वीरवती पत्नी अमरनाथ निवासी ग्राम कांवली, बल्लीवाला, देहरादून के रूप में की गयी है।बचाव कार्य के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों के नाम अ.उ.नि. नरेंद्र कुमार (ट्रैफिक), कानि. बृजमोहन रावत (थाना नेहरू कॉलोनी) व कानि. बृजमोहन कनवासी (थाना नेहरू कॉलोनी) बताये जा रहे है।
May 20, 2026नम आंखों के बीच पंचतत्व में विलीन हुए जनरल बीसी खंडूड़ी देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति और भारतीय सेना का एक अनुशासित, सादगीपूर्ण और ईमानदार चेहरा आज पंचतत्व में विलीन हो गया। मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी की अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब केवल एक राजनेता को विदाई देने नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व को अंतिम प्रणाम करने पहुंचा था, जिसने जीवनभर अनुशासन, सादगी और जनसेवा को अपनी पहचान बनाए रखा।तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर जब अंतिम यात्रा के लिए निकला तो माहौल गमगीन हो उठा। हर आंख नम थी, हर चेहरा शांत और हर मन में एक ही भावकृएक ईमानदार दौर अब स्मृति बन गया। सेना के जवानों की सलामी, गूंजते राष्ट्रगान और खंडूड़ी अमर रहें के नारों के बीच जैसे पूरा उत्तराखंड अपने उस जनरल को विदा कर रहा था, जिसने सत्ता में रहकर भी सादगी नहीं छोड़ी। अंतिम यात्रा में बुजुर्गों की आंखों में सम्मान था तो युवाओं के चेहरों पर एक अलग तरह की उदासी। पहाड़ के गांवों से आए कई लोग सिर्फ एक झलक पाने के लिए घंटों खड़े रहे। उनके लिए खंडूड़ी केवल मुख्यमंत्री नहीं थे, बल्कि राजनीति में भरोसे और साफ छवि का प्रतीक थे।उत्तराखंड की राजनीति में अक्सर यह कहा जाता रहा कि खंडूड़ी हैं जरूरी। यह केवल चुनावी नारा नहीं था, बल्कि उस जनविश्वास की अभिव्यक्ति थी जो उन्होंने अपने व्यवहार और निर्णयों से अर्जित किया। राजनीति के शोर और आरोपों के बीच भी उनकी छवि एक सख्त लेकिन ईमानदार प्रशासक की बनी रही। सेना से राजनीति तक का उनका सफर भी असाधारण रहा। फौजी अनुशासन उनके व्यक्तित्व में अंतिम समय तक दिखाई देता रहा। शायद यही कारण था कि उनकी अंतिम यात्रा में केवल राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि आम लोग, पूर्व सैनिक, युवा और कर्मचारी वर्ग भी बड़ी संख्या में मौजूद रहा।हरिद्वार में गंगा की लहरों की कलकल के बीच जब उनके पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी गई, तो मानो पहाड़ का एक रक्षक हमेशा के लिए सो गया। अंतिम यात्रा देहरादून से शुरू होकर जैसे-जैसे आगे बढ़ी, सड़क के दोनों ओर हजारों की संख्या में लोग हाथ जोड़े, आंखों में आंसू लिए खड़े थे। पवित्र गंगा घाट पर जब सेना के बिगुल ने अंतिम शोक धुन बजाई, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें छलक उठीं। मातमी धुन के बीच सेना के जवानों ने हवा में गोलियां दागकर अपने पूर्व जनरल को अंतिम सलामी दी।जब चिता की लपटें उठीं तो कई आंखें भर आईं। ऐसा लगा जैसे उत्तराखंड की राजनीति का एक सादा, शांत और विश्वसनीय अध्याय धीरे-धीरे धुएं में बदलकर इतिहास का हिस्सा बन रहा हो। समय आगे बढ़ जाएगा, नई सरकारें आएंगी, नए चेहरे भी उभरेंगे, लेकिन पहाड़ की राजनीति में ईमानदारी, सादगी और अनुशासन की चर्चा जब भी होगी, जनरल खंडूड़ी का नाम उसी सम्मान के साथ लिया जाएगा जैसे आज उनकी अंतिम यात्रा में हर जुबान पर था। गंगा मां की गोद में विलीन हुए इस पहाड़ के गौरव को पूरा देश और उत्तराखंड हमेशा कृतज्ञ भाव से याद रखेगा।अंतिम सलाम, मेजर जनरल! आपकी कमी हमेशा खलेगी।
May 20, 2026मेजर जनरल भुवन चंद खंडूरी अब हमारे बीच नहीं रहे। कल दोपहर जैसे ही यह समाचार आया तो हर एक मन को एक धक्का जैसा लगा। प्रतीत हुआ जैसे कोई बहुमूल्य वस्तु हमसे छीन ली गई हो जिसकी रिक्तता को भरना मुश्किल ही नहीं असंभव है। मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है। नौ दशक लंबा जीवन कम नहीं होता है। बीसी खंडूरी ने निसंदेह एक भरा—पूरा और सफल ऐसा जीवन जिया जो कुछ ही भाग्यशाली लोगों को या यूं कहें कर्मवीरों को नसीब होता है। बचपन से लेकर शिक्षा दीक्षा और देश सेवा के लिए समर्पित जीवन के 39 साल जो उन्होंने सेना को दिए तथा लगभग 30 साल जो राजनीति को दिए हर जगह उन्होंने अपनी अनुशासनिक कठोर कार्य श्ौली का परिचय दिया। जिसके कारण उन्हें सेना का अति विशिष्ट सेवा पदक दिया गया। राजनीति जिसको काजल की कोठरी कहा जाता है, जैसे क्षेत्र में अपनी ईमानदार छवि और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख रखने वाले बीसी खंडूरी को अगर पूरा देश मिस्टर क्लीन के नाम से जानता है तो यह वर्तमान दौर के राजनीतिक परिवेश में उनकी बड़ी उपलब्धियों में से एक है। स्वर्गीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के सानिध्य में अपनी राजनीतिक पाली शुरू करने वाले बीसी खंडूरी पांच बार पौड़ी संसदीय सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा सदस्य रहे तथा उनकी सरकार में 2003—2004 में भूतल परिवहन मंत्रालय का कार्य भी संभाला। इस दौरान उनके द्वारा पूरे देश के चारों कोनों को जोड़ने के लिए शुरू की गई स्वर्ण चतुर्भुज जैसी परियोजना को लाकर किया, जो अत्यंत ही चर्चित रही। कई लोग उस समय उन्हें मजाकिया अंदाज में रोड मिनिस्टर की जगह रोड मास्टर भी कहते थे। अपनी बेदाग छवि निष्पक्ष और ईमानदार कार्यश्ौली और कठोर अनुशासित शासन के लिए पक्ष ही नहीं विपक्ष के नेता भी उनकी हमेशा सराहना करते रहे हैं। 2007 में जब भाजपा उत्तराखंड में सत्ता में आई तो केंद्रीय नेतृत्व द्वारा उत्तराखंड का मुख्यमंत्री उन्हें नियुक्त किया गया। लेकिन राज्य की भाजपा ने सहजता से उन्हें स्वीकार नहीं किया गया क्योंकि उन्हें वैसी अनुशासन कार्यश्ौली की आदत ही नहीं थी जैसी की बीसी खंडूरी को पसंद थी देश में उत्तराखंड पहला राज्य था जहां बीसी खंडूरी द्वारा लोकायुक्त का गठन किया गया। अन्ना हजारे के आंदोलन से भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे मारक माने जाने वाले लोकायुक्त का आज तक भी विधिवत गठन राज्य के नेताओं ने नहीं होने दिया क्योंकि वह वित्तीय अनुशासन चाहते ही नहीं है। इसी एक कारण ने उन्हें सीएम की कुर्सी पर नहीं टिकने दिया वह भले ही 2012 के चुनाव से पूर्व दोबारा सीएम बना दिए गए थे लेकिन पार्टी के षड्यंत्रकारी नेताओं ने उन्हें चुनाव हरा दिया। भले ही आज वर्तमान की राजनीति में सीएम पुष्कर सिंह धामी को कोई धाकड़ धामी और कोई धुरंधर धामी जैसी शब्दावली से नवाजता हो लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में बीसी खंडूरी जैसा न धाकड़ सीएम कोई रहा है न कोई धुरंधर रहा है अपनी ईमानदार बेदाग छवि और कठोर अनुशासन प्रियता के कारण सूबे की राजनीति में उन्हें जो सम्मान हासिल है उसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं हो सकता। उनके कृतित्व और सेवाओं के लिए समाज उनका सदैव ऋणी रहेगा। ईश्वर उनकी दिव्य आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें। उनका जाना समाज व राजनीति के लिए अपूरक क्षति है जिसे कोई पूरा नहीं कर सकता।