- बारिश बनी राहत भी, आफत भी,अस्पतालों में बढ़ी निगरानी
- प्रदेश के नगर निकायों को युद्धस्तर पर अभियान के निर्देश
देहरादून। उत्तराखंड में लगातार हो रही मानसूनी बारिश जहां गर्मी से राहत लेकर आई है, वहीं इसके साथ एक नया खतरा भी तेजी से सिर उठाने लगा हैकृडेंगू। बारिश के कारण जगह-जगह जलभराव, नालियों में ठहरा पानी, निर्माण स्थलों पर जमा वर्षा जल और घरों के आसपास रखे खुले बर्तनों में पानी भरने से एडीज मच्छरों के पनपने की आशंका बढ़ गई है। इसी खतरे को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन हाई अलर्ट पर हैं। अस्पतालों में विशेष निगरानी बढ़ा दी गई हैए जबकि नगर निकायों और स्वास्थ्य टीमों को रोकथाम के लिए व्यापक अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं। प्रदेश के कई जिलों में स्वास्थ्य विभाग ने डेंगू की रोकथाम को लेकर सर्विलांस तेज कर दिया है। सरकारी अस्पतालों में बुखार से पीड़ित मरीजों की जांच बढ़ाई जा रही है, जबकि निजी अस्पतालों से भी संदिग्ध मामलों की नियमित जानकारी मांगी जा रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून के दौरान थोड़ी सी लापरवाही भी संक्रमण को तेजी से फैलने का मौका दे सकती है।
डेंगू से लड़ाई केवल अस्पतालों में नहीं जीती जा सकती। इसकी असली लड़ाई घरों, गलियों और मोहल्लों में लड़ी जाती है। प्रशासन ने नगर निगमए नगर पालिकाओं और ग्राम पंचायतों को जलभराव वाले स्थानों की पहचान कर तत्काल सफाई, फागिंग और एंटी लार्वा दवा के छिड़काव के निर्देश दिए हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीमें घर-घर जाकर लोगों को जागरूक करने में जुटी हैं। एडीज मच्छर साफ और ठहरे हुए पानी में पनपता है। इसलिए घरों की छतों, कूलर, गमलों, टायरों, पानी की टंकियों और अन्य पात्रों में जमा पानी नियमित रूप से खाली करना सबसे प्रभावी उपाय है।
सरकारी अस्पतालों में डेंगू जांच की व्यवस्था मजबूत की जा रही है। चिकित्सकों को निर्देश दिए गए हैं कि तेज बुखार, शरीर में दर्द, सिरदर्द, आंखों के पीछे दर्द या प्लेटलेट्स कम होने जैसे लक्षणों वाले मरीजों की समय पर जांच सुनिश्चित की जाए। स्वास्थ्य विभाग का जोर इस बात पर है कि संदिग्ध मरीजों की पहचान शुरुआती चरण में हो, ताकि गंभीर स्थिति बनने से पहले इलाज शुरू किया जा सके।
उत्तराखंड में मानसून के दौरान अक्सर लोग भूस्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं पर अधिक ध्यान देते हैं, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि डेंगू जैसी बीमारियां भी उतनी ही गंभीर चुनौती बन सकती हैं। यदि समय रहते रोकथाम नहीं की गई, तो मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है और स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि डेंगू की रोकथाम केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं है। यदि लोग सप्ताह में एक दिन अपने घर और आसपास जमा पानी की जांच करें, पानी की टंकियों को ढककर रखें, पूरी बाजू के कपड़े पहनें और मच्छररोधी उपाय अपनाएं तो संक्रमण का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है।
हर वर्ष मानसून के साथ डेंगू का खतरा सामने आता है। सवाल यह है कि क्या हमारी तैयारी भी हर साल उतनी ही मजबूत होती है क्या नालों की सफाई समय पर होती है क्या जलभराव वाले स्थानों की स्थायी पहचान कर समाधान निकाला जाता है क्या शहरी विकास योजनाओं में जल निकासी को पर्याप्त महत्व दिया जाता है। यदि इन सवालों के जवाब संतोषजनक नहीं हैं, तो केवल फागिंग और जागरूकता अभियान से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा।
मानसून प्रकृति का उत्सव है, लेकिन लापरवाही इसे बीमारी का मौसम भी बना सकती है। डेंगू के खिलाफ प्रशासन की सक्रियता जरूरी है पर उससे भी अधिक जरूरी है नागरिकों की भागीदारी। यदि सरकार की तैयारी और जनता की जागरूकता साथ चले तभी इस मानसून में डेंगू के खतरे को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है। वरना बारिश की बूंदों के साथ मच्छरों का खतरा भी हर घर की दस्तक बन सकता है।




