- मानसून में सिर्फ बारिश नहीं, चट्टानों से मौत भी लुढ़क कर नीचे आती है पहाड़ी क्षेत्रों में
- रेड-आरेंज अलर्ट नहीं समझता पहाड़ी मन, बादल घिरते ही सहम जाती हैं छतें और ढलानें
- स्कूल गए बच्चे, सड़क पर दौड़ती टैक्सी, रात को बेघर होने की आशंका में बिसूरते बुजुर्ग
- पहाड़ में आफत बनकर बरसती है बारिश, विकास के दावों के बीच मौत का अनवरत पहरा
देहरादून। उत्तराखंड में बारिश का मौसम शुरू होते ही मौसम विभाग का एक नया शब्द हमारे जीवन का हिस्सा बन जाता है आरेंज अलर्ट, रेड अलर्ट, भारी से बहुत भारी बारिश। लेकिन पहाड़ का आदमी मौसम विभाग की भाषा नहीं समझता। वह सिर्फ इतना जानता है कि जब बादल घिरते हैं तो उसके घर की छत, खेत की मेड़, सड़क का किनारा और पहाड़ की ढलान सब एक साथ डराने लगते हैं। यह डर काल्पनिक नहीं है। यह डर उस बच्चे का है जो स्कूल गया है और शाम तक घर नहीं लौटा। यह डर उस मां का है, जिसका बेटा टैक्सी चलाकर परिवार पालता है और हर बारिश में भूस्खलन वाले रास्तों से गुजरता है। यह डर उस बुजुर्ग का है, जिसे रात में यह नहीं पता कि सुबह तक उसका घर उसी जगह रहेगा या मलबे में दब जाएगा। पहाड़ में बारिश सिर्फ आसमान से नहीं गिरती। मौत भी पहाड़ की चट्टानों से लुढ़कती हुई नीचे आती है।
बरसात शुरू होते ही सड़कें बंद होने लगती हैं। कहीं पहाड़ दरक जाता है, कहीं पुल बह जाता है, कहीं नदी अपना रास्ता बदल देती है। प्रशासन हर साल कहता है कि तैयारी पूरी है। मशीनें तैनात हैं। आपदा प्रबंधन अलर्ट पर है। लेकिन सवाल यह है कि अगर तैयारी पूरी है, तो हर साल वही तस्वीरें क्यों दोहराई जाती हैं? क्यों हर मानसून में सैकड़ों गांव दुनिया से कट जाते हैं? क्यों मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते? क्यों गर्भवती महिलाओं को डोली में उठाकर कई किलोमीटर चलना पड़ता है? क्यों बच्चों की पढ़ाई रुक जाती है? पहाड़ का आदमी बारिश से नहीं हारता। वह व्यवस्था की लापरवाही से हारता है।
उत्तराखंड की त्रासदी यह है कि यहां सड़क बनती भी है तो अगली बरसात में बह जाती है। पुल बनता है तो पहली बाढ़ में कमजोर पड़ जाता है। पहाड़ काटे जाते हैं, लेकिन यह सोचने की फुर्सत कम दिखाई देती है कि प्रकृति का भी अपना संतुलन होता है। विकास जरूरी है, लेकिन विकास का मतलब यह नहीं कि पहाड़ की छाती को बिना समझे काट दिया जाए। आज पहाड़ का नागरिक एक अजीब मनःस्थिति में जी रहा है। वह घर से निकलते समय यह नहीं सोचता कि कितनी देर में पहुंचेगा। वह यह सोचता है कि पहुंच भी पाएगा या नहीं। आप जरा कल्पना कीजिए। एक बस में बैठे यात्री को यह पता नहीं कि अगले मोड़ पर सड़क होगी या नहीं। एक टैक्सी चालक को नहीं पता कि जिस पहाड़ के नीचे से वह गुजर रहा है, वह अगले पांच मिनट में वहीं रहेगा या टूटकर उसके ऊपर आ जाएगा। यह सिर्फ यात्रा नहीं है, यह हर दिन मौत के साथ समझौता है। और सबसे दुखद बात यह है कि कुछ दिन बाद सब सामान्य हो जाता है। टीवी चैनलों पर दूसरी खबरें आ जाती हैं। सोशल मीडिया पर नई बहस शुरू हो जाती है। पहाड़ में मारे गए लोगों के नाम धीरे-धीरे सरकारी फाइलों में बदल जाते हैं।
क्या पहाड़ की जिंदगी इतनी सस्ती है?क्या हर मानसून में कुछ लोगों की मौत को हमने नियति मान लिया है?क्या आपदा केवल राहत राशि बांटने का अवसर है? सवाल केवल प्राकृतिक आपदा का नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या हमने पहाड़ के लिए ऐसी विकास नीति बनाई है जो उसकी भौगोलिक संवेदनशीलता को समझती हो? क्या सड़क निर्माण, भवन निर्माण और पर्यटन परियोजनाओं में वैज्ञानिक सलाह को पर्याप्त महत्व दिया जाता है? क्या जोखिम वाले क्षेत्रों में समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने की गंभीर योजना है? पहाड़ केवल पर्यटन स्थल नहीं है। वहां लाखों लोग रहते हैं। उनके सपने हैं, उनका संघर्ष है, उनका जीवन है। हर बरसात में उन्हें यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उनका सबसे बड़ा दुश्मन बादल नहीं, बल्कि व्यवस्था की तैयारी की कमी है।
बारिश पर किसी का बस नहीं चलता। लेकिन बारिश को आपदा बनने से रोकने की तैयारी इंसान के हाथ में है। जब तक सड़कें मौसम के हिसाब से नहीं बनेंगी, जब तक पहाड़ की प्रकृति को समझकर विकास नहीं होगा, जब तक चेतावनी के साथ सुरक्षित विकल्प भी नहीं होंगे, तब तक उत्तराखंड में मानसून का मतलब रहेगा, सिर पर मंडराती मौत। और शायद पहाड़ का सबसे बड़ा दर्द यही है कि यहां लोग बारिश की बूंदें नहीं गिनते, बल्कि हर बरसात में यह गिनते हैं कि इस बार मौत किस गांव का पता पूछते हुए आई।




