अयोध्या का राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है। करोड़ों लोगों की आस्था, वर्षों के संघर्ष और राष्ट्रीय भावनाओं का प्रतीक है। इसलिए जब राम मंदिर के चढ़ावे में कथित चोरी या अनियमितता का मुद्दा संसद तक पहुँचता है, तो यह केवल विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय नहीं रह जाता। यह देश की आस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है। संसद में इस मुद्दे पर जिस तरह हंगामा हुआ, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या हम हर संवेदनशील विषय को राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू पर तौलने लगे हैं? सत्ता पक्ष विपक्ष पर राजनीति करने का आरोप लगाता है, तो विपक्ष सरकार से जवाब मांगता है। लेकिन इस शोर-शराबे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल कहीं पीछे छूट जाता है सच्चाई क्या है? यदि चढ़ावे में किसी प्रकार की गड़बड़ी हुई है, तो उसकी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होनी चाहिए। यदि आरोप निराधार हैं, तो तथ्यों के साथ उन्हें खारिज किया जाना चाहिए। लोकतंत्र में न तो आरोपों को बिना जांच के सच मान लिया जाना चाहिए और न ही केवल राजनीतिक असुविधा के कारण सवाल पूछने वालों को खामोश करने की कोशिश होनी चाहिए। राम मंदिर में देश-विदेश से श्रद्धालु करोड़ों रुपये, सोना-चांदी और अन्य मूल्यवान वस्तुएँ श्रद्धा के साथ अर्पित करते हैं। यह केवल धन नहीं, बल्कि लोगों का विश्वास है। उस विश्वास की रक्षा करना मंदिर प्रशासन, संबंधित ट्रस्ट और सरकार सभी की साझा जिम्मेदारी है। इसलिए वित्तीय लेन-देन, दान और चढ़ावे के प्रबंधन में उच्च स्तर की पारदर्शिता अनिवार्य है। दूसरी ओर, विपक्ष की भी जिम्मेदारी है कि वह तथ्यात्मक आधार पर सवाल उठाए। यदि उसके पास दस्तावेज़ या ठोस प्रमाण हैं, तो उन्हें सार्वजनिक करे और निष्पक्ष जांच की मांग करे। लेकिन यदि केवल राजनीतिक माहौल बनाने के लिए आरोप लगाए जाते हैं, तो इससे लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होता है और जनता का भरोसा भी प्रभावित होता है। संसद बहस का मंच है, शोर का नहीं। यदि हर संवेदनशील मुद्दा केवल नारेबाजी में बदल जाएगा, तो समाधान कभी नहीं निकलेगा। जनता यह अपेक्षा करती है कि संसद में आरोपों का जवाब तथ्यों से दिया जाए, न कि केवल राजनीतिक नारों से। यह मामला केवल राम मंदिर का नहीं है। देश के सभी बड़े धार्मिक संस्थानों चाहे वे मंदिर हों, मस्जिद, गुरुद्वारे या चर्च में प्राप्त दान और चढ़ावे के प्रबंधन में पारदर्शिता और नियमित लेखा-परीक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। आस्था जितनी बड़ी होती है, जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए। राम मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। इसलिए उससे जुड़ा कोई भी आरोप अत्यंत गंभीरता से लिया जाना चाहिए। राजनीतिक दलों को इस विषय पर संयम और जिम्मेदारी दिखानी चाहिए। सरकार और संबंधित संस्थाओं को यदि कोई संदेह पैदा हुआ है, तो उसे दूर करने के लिए पूरी पारदर्शिता के साथ तथ्यों को सामने रखना चाहिए। वहीं विपक्ष को भी तथ्य और प्रमाण के आधार पर अपनी बात रखनी चाहिए। आस्था का सम्मान तभी सुरक्षित रहेगा, जब उसके साथ जुड़ी हर व्यवस्था भी पारदर्शी और जवाबदेह होगी। संसद का दायित्व है कि वह इस विश्वास को मजबूत करे, न कि उसे राजनीतिक टकराव का माध्यम बनाए।




