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पेट्रोल-डीजल का बीमा

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देश में सड़क सुरक्षा, पर्यावरण और उपभोक्ता संरक्षण को लेकर लगातार नई नीतियां बनाई जा रही हैं। अब यदि पेट्रोल और डीजल की बिक्री को बीमा से जोड़ने की व्यवस्था लागू होती है, तो यह एक बड़ा नीतिगत बदलाव होगा। सवाल यह नहीं है कि बीमा होना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि इसका बोझ कौन उठाएगा और इससे सबसे अधिक लाभ किसे मिलेगा? भारत में करोड़ों दोपहिया और चारपहिया वाहन सड़क पर चलते हैं। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो हर साल बीमा का नवीनीकरण नहीं कराते। दुर्घटना होने पर नुकसान केवल वाहन मालिक का नहीं होता, बल्कि पीड़ित व्यक्ति को भी उचित मुआवजा मिलने में वर्षों लग जाते हैं। ऐसे में यदि पेट्रोल पंप पर ईंधन भरवाने से पहले बीमा की वैधता सुनिश्चित करने की व्यवस्था बनती है, तो पहली नजर में यह सड़क सुरक्षा की दिशा में एक सकारात्मक कदम दिखाई देता है। लेकिन किसी भी नीति की सफलता उसके उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन से तय होती है। देश में पहले से ही प्रदूषण प्रमाणपत्र, फिटनेस, ड्राइविंग लाइसेंस, वाहन पंजीकरण और कई अन्य नियम लागू हैं। बावजूद इसके नियमों के पालन की स्थिति संतोषजनक नहीं है। यदि बीमा जांच की जिम्मेदारी भी पेट्रोल पंप संचालकों पर डाल दी जाती है, तो क्या इससे व्यवस्था आसान होगी या और अधिक जटिल? एक दूसरा पहलू भी है। भारत में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो गांवों और छोटे कस्बों में सीमित आय पर जीवनयापन करते हैं। उनके लिए बीमा प्रीमियम भी एक अतिरिक्त आर्थिक बोझ है। यदि बीमा समाप्त होने पर उन्हें पेट्रोल या डीजल ही नहीं मिलेगा, तो उनका वाहन सीधे-सीधे सड़क से बाहर हो जाएगा। क्या सरकार ऐसे लोगों के लिए कोई राहत या किस्तों में बीमा जैसी व्यवस्था करेगी? यदि नहीं, तो यह नियम गरीब और मध्यम वर्ग पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है। सरकार का तर्क होगा कि बीमा वाहन मालिक की जिम्मेदारी है। यह तर्क अपनी जगह सही भी है। लेकिन सरकार की जिम्मेदारी यह भी है कि बीमा सस्ता, पारदर्शी और आसानी से उपलब्ध हो। आज भी कई लोग एजेंटों और जटिल प्रक्रियाओं के कारण समय पर बीमा नहीं करा पाते। सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या केवल बीमा ही सड़क दुर्घटनाओं का समाधान है? देश में दुर्घटनाओं के प्रमुख कारणों में खराब सड़कें, अवैज्ञानिक डिजाइन, ओवरलोडिंग, तेज रफ्तार और यातायात नियमों की अनदेखी शामिल हैं। यदि इन मूल समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तो केवल बीमा अनिवार्य कर देने से सड़कें सुरक्षित नहीं हो जाएंगी। इस नीति का एक आर्थिक पक्ष भी है। यदि करोड़ों नए वाहन बीमा दायरे में आते हैं, तो बीमा उद्योग का कारोबार कई गुना बढ़ सकता है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि यह निर्णय केवल व्यावसायिक हितों को बढ़ावा देने का माध्यम न बन जाए। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि उपभोक्ताओं के हित सर्वाेपरि रहेंगे और बीमा कंपनियां मनमाने प्रीमियम नहीं वसूल सकेंगी। तकनीकी दृष्टि से देखा जाए तो डिजिटल इंडिया के दौर में यह व्यवस्था संभव है। वाहन का नंबर दर्ज होते ही बीमा, प्रदूषण प्रमाणपत्र और अन्य दस्तावेज स्वतः सत्यापित हो सकते हैं। लेकिन इसके लिए मजबूत डिजिटल ढांचा, डेटा सुरक्षा और निर्बाध नेटवर्क अनिवार्य होगा। यदि तकनीकी खामियां सामने आईं, तो सबसे अधिक परेशानी आम नागरिक को ही होगी। असल जरूरत दंडात्मक व्यवस्था से अधिक जागरूकता की है। यदि लोग यह समझें कि बीमा केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि दुर्घटना की स्थिति में आर्थिक सुरक्षा का कवच है, तो स्वेच्छा से अनुपालन बढ़ेगा। सरकार को बीमा प्रीमियम को अधिक किफायती बनाने, आनलाइन प्रक्रिया को सरल करने और समय-समय पर विशेष अभियान चलाने पर भी ध्यान देना चाहिए। यदि पेट्रोल और डीजल की बिक्री को बीमा से जोड़ने का उद्देश्य सड़क सुरक्षा और नागरिकों की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन यदि यह व्यवस्था बिना पर्याप्त तैयारी, तकनीकी आधार और जनसुविधा के लागू की जाती है, तो यह आम जनता के लिए नई परेशानी बन सकती है। नीतियां तभी सफल होती हैं जब उनमें कानून की सख्ती के साथ जनहित की संवेदनशीलता भी शामिल हो। सरकार को ऐसा संतुलन बनाना होगा, जहां सड़क सुरक्षा भी मजबूत हो, बीमा का दायरा भी बढ़े और आम नागरिक को यह महसूस न हो कि हर नई व्यवस्था अंततः उसी की जेब पर भारी पड़ रही है।

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