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एसआईआर में 75 साल के बुजुर्ग से दस्तावेज मांगने पर उठ रहे हजारों सवाल

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  • 75 साल की उम्र, 50 साल का वोट व एक हाईस्कूल मार्कशीट की जलालत
  • सरकारें चुनने वाला बुजुर्ग अब खुद की पहचान साबित करने को है मोहताज
  • लोकतंत्र के सामने नागरिक को अपनी पहचान साबित करने को किया मजबूर

देहरादून। एक आदमी 75 साल का हो चुका है। उसके बाल सफेद हैं। चेहरे पर उम्र की लकीरें हैं। जिंदगी का बड़ा हिस्सा उसने इसी देश में गुजारा है। उसने सरकारें बदलते देखीं। प्रधानमंत्रियों को आते-जाते देखा। मुख्यमंत्रियों के चेहरे बदले। चुनाव के नारों को बदलते देखा। गांवों को कस्बों में बदलते देखा और कस्बों को शहर बनते देखा और इन तमाम बदलावों के बीच एक चीज नहीं बदली उसका वोट। करीब पांच दशक तक वह चुनाव आया तो मतदान केंद्र तक गया। कतार में खड़ा हुआ। पहचान बताई। वोट डाला और घर लौट आया। लेकिन आज, 75 साल की उम्र में व्यवस्था उसके सामने एक नया सवाल लेकर खड़ी है हाईस्कूल की मार्कशीट दिखाइए। यह सिर्फ एक कागज मांगने की कहानी नहीं है। यह उस रिश्ते की कहानी है जो नागरिक और लोकतंत्र के बीच बनता है और सवाल यह है कि क्या पांच दशक तक वोट देने वाला नागरिक आज एक मार्कशीट से छोटा हो गया है।
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त करना है। फर्जी नाम हटें, मृत मतदाताओं के नाम हटें, गलत प्रविष्टियां सुधरें और वास्तविक मतदाता सूची में रहें इस उद्देश्य पर सवाल नहीं होना चाहिए। सवाल उस तरीके पर है, जिसमें प्रक्रिया आम आदमी के लिए भय और परेशानी का कारण बनने लगे। एक 75 वर्षीय व्यक्ति से हाईस्कूल की मार्कशीट मांगना शायद कागज पर एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया लगे। लेकिन उस व्यक्ति की जिंदगी में जाकर देखिए। उसने हाईस्कूल किस साल पास किया होगा। उस समय स्कूलों में रिकार्ड आज की तरह डिजिटल नहीं थे। कितने स्कूलों की पुरानी इमारतें आज भी मौजूद हैं। कितने स्कूलों के पुराने रजिस्टर सुरक्षित हैं। कितने लोगों के पास 50-60 साल पुराने प्रमाणपत्र आज भी सुरक्षित होंगे और अगर वह कागज खो गया तो क्या नागरिकता, मतदाता पहचान और लोकतांत्रिक अधिकार का पूरा भार अब एक पुराने कागज पर टिका दिया जाएगा।
व्यवस्था कह सकती है दस्तावेज तो चाहिए, ठीक है। लेकिन फिर अगला सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि दस्तावेज जुटाने की जिम्मेदारी किसकी है। 75 साल का बुजुर्ग सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाए, स्कूल की पुरानी फाइल खोजे, तहसील जाए, ब्लाक जाए, जन्म प्रमाणपत्र तलाशे, पुराने रिकार्ड निकलवाए और अगर रिकार्ड किसी दफ्तर में उपलब्ध ही नहीं है तो फिर क्या। क्या उसे यह साबित करना होगा कि वह पिछले 50 वर्षों से वोट क्यों देता आया। क्या वह अपनी जिंदगी की गवाही लेकर सरकारी दफ्तर में खड़ा होगा। यह वही देश है जहां गांव का एक बुजुर्ग पूरे इलाके को पहचानता है और पूरा गांव उसे पहचानता है। लेकिन कागज की दुनिया कहती है गांव तुम्हें जानता हो तो जानता रहे, पहले दस्तावेज दिखाओ। यहीं से लोकतंत्र और कागजी व्यवस्था के बीच की खाई दिखाई देती है।
लोकतंत्र में नागरिक राज्य का मालिक माना जाता है। वह वोट देता है, वह टैक्स देता है, वह कानून मानता है, वह सरकार चुनता है। लेकिन धीरे-धीरे एक ऐसी प्रशासनिक भाषा विकसित होती जा रही है, जिसमें नागरिक से पहले पूछा जाता है आप साबित कीजिए कि आप वही हैं जो आप कहते हैं। यह सवाल सुनने में सामान्य है, लेकिन इसके पीछे छिपा डर बहुत बड़ा है। क्योंकि गरीब के पास दस्तावेज कम हो सकते हैं। बुजुर्ग के कागज खो सकते हैं। गांव में रहने वाले व्यक्ति के रिकार्ड पुराने हो सकते हैं। महिलाओं के नाम विवाह के बाद बदल सकते हैं। परिवारों के पते बदल सकते हैं। गांवों के नाम बदल सकते हैं और कई लोगों के जीवन में दस्तावेज हमेशा उनकी जिंदगी से पीछे चलते रहे हैं। तो क्या अब दस्तावेजों की कमी को नागरिक की कमी मान लिया जाएगा।
मतदाता सूची में गड़बड़ी नहीं होनी चाहिए। यह लोकतंत्र की पहली शर्तों में से एक है। लेकिन मतदाता सूची को साफ करने की प्रक्रिया में अगर वास्तविक मतदाता ही डरने लगे तो प्रशासन को एक बार रुककर सोचना चाहिए। क्योंकि चुनाव आयोग के सामने सिर्फ कागज नहीं हैं। कागज के पीछे इंसान हैं। एक बुजुर्ग है। एक विधवा है। एक प्रवासी मजदूर है। एक पहाड़ी गांव का परिवार है। एक ऐसा व्यक्ति है जिसने अपना अधिकांश जीवन गांव में बिताया और अब उसके बच्चे शहरों में रहते हैं। इन लोगों से दस्तावेज मांगना गलत नहीं है। लेकिन उन्हें दस्तावेज जुटाने की सहायता दिए बिना सिर्फ नोटिस थमा देना सवाल जरूर खड़ा करता है।
कल्पना कीजिए, एक बुजुर्ग के घर बीएलओ आता है। हाथ में नोटिस है। कहता है दस्तावेज जमा करने होंगे। बुजुर्ग कागजों की पुरानी पेटी खोलता है। एक-एक कागज निकालता है। कुछ पढ़ने लायक हैं। कुछ फट चुके हैं। कुछ पर स्याही धुंधली हो चुकी है। कुछ मिलते ही नहीं। फिर घर में सवाल शुरू होता है अब क्या होगा,नाम कट तो नहीं जाएगा ,वोट दे पाएंगे या नहीं, बच्चों को बुलाना पड़ेगा, दफ्तर कौन जाएगा। एक सरकारी प्रक्रिया धीरे-धीरे परिवार की चिंता बन जाती है। यही वह बिंदु है जहां प्रशासन को समझना होगा कि कानून और प्रक्रिया की भाषा एक जैसी नहीं होती।कानून कागज मांग सकता है। लेकिन प्रशासन को इंसान भी दिखाई देना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यही है। यदि कोई व्यक्ति दशकों से मतदाता सूची में दर्ज है, लगातार चुनावों में मतदान करता रहा है, उसके पास दूसरे सरकारी दस्तावेज हैं, स्थानीय स्तर पर उसकी पहचान है, तो इन तमाम तथ्यों का महत्व क्या है। क्या हर पीढ़ी को अपने अस्तित्व का नया प्रमाण देना होगा। क्या 75 साल की उम्र में भी नागरिक कहेगा मैं हूं और सरकार जवाब देगी पहले साबित करो। फिर लोकतंत्र किसके लिए है। क्या लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव के दिन वोट डालना है। या लोकतंत्र का मतलब यह भी है कि राज्य अपने नागरिक पर भरोसा करे।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में यह सवाल और गंभीर हो जाता है। यहां हजारों गांवों की सामाजिक स्मृति कागजों से नहीं चलती। गांव में किसी व्यक्ति की पहचान उसके घर, परिवार, खेत, रिश्तों और पीढ़ियों से होती है। एक बुजुर्ग के बारे में गांव का बच्चा तक जानता है कि वह कौन है। लेकिन सरकारी फार्म पर उसका अस्तित्व कुछ कालम में बंट जाता है नाम,पिता का नाम,जन्मतिथि,पता,दस्तावेज संख्या और फिर एक बाक्स में प्रमाण संलग्न करें। जिस आदमी की जिंदगी 75 साल की है, उसकी पहचान एक बाक्स में समा जाती है और अगर उस बाक्स में कागज नहीं है तो क्या उसकी पूरी जिंदगी अधूरी मान ली जाएगी।

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