सत्ता पर झपट्टे की रणनीति

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तीन दिन बाद पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने हैं। 10 मार्च को आने वाले इन चुनावी नतीजों से पहले सभी राजनीतिक दलों के बारे में रणनीति बनाने की खबरें आ रही है। चुनावी नतीजों पर रणनीति बनाने की इन खबरों के बारे में लोग सोच रहे हैं कि चुनाव परिणाम तो जैसे आने हैं वैसे आएंगे ही इसमें राजनीतिक दलों की रणनीति क्या करेगी? जिसे जितनी सीटें मिलनी है उतनी ही मिलेगी इस रणनीति से सीटें कम या ज्यादा तो हो नहीं सकती फिर इस रणनीति की क्या जरूरत है? दरअसल यह रणनीति चुनाव परिणामों की रणनीति नहीं है यह रणनीति सत्ता पर झपट्टे की रणनीति है। यह रणनीति लोकतंत्र के चीरहरण की राजनीति है जिसका उद्देश्य है बहुमत मिले या न मिले लेकिन सत्ता कैसे मिल सकती है इसकी राजनीति और रणनीति है। आज की राजनीति में जब यह जरूरी नहीं रहा है कि सरकार उसी दल की बनेगी जिसने बहुमत के लिए सीटें जीती होगी। तब ऐसी स्थिति में इस रणनीति का ही सबसे ज्यादा महत्व होता है। 2012 में कांग्रेस के पक्ष में जनादेश आया उसकी सरकार भी बन गई, लेकिन 2016 में जो हुआ उसे हम सभी जानते हैं यह अलग बात है कि हरीश रावत अपनी सरकार को बचा ले गए, लेकिन एक बारगी तो काग्रेस की सरकार चली ही गई थी। मध्य प्रदेश का उदाहरण हमारे सामने हैं जहां जनता ने कांग्रेस को सरकार बनाने का जनादेश दिया लेकिन वहां अभी भी शिवराज सिंह भाजपा की सरकार चला रहे हैं। एक नहीं इस तरह के तमाम उदाहरण हैं। जिन पांच राज्यों के 10 मार्च को नतीजे आने हैं उन तमाम राज्यों के नतीजों को लेकर राजनीतिक दल जो रणनीति बना रहे हैं वह भी कुछ ऐसी ही रणनीति है। अगर किसी दल को ठीक—ठाक मजबूत बहुमत मिल गया तो अलग बात है लेकिन अगर बात बहुमत के आस—पास रहने की स्थितियां बनती है तो यही रणनीति अपना रंग दिखाती है। विधायकों की खरीद—फरोख्त करनी पड़े या फिर किसी दल में विभाजन कुछ भी किया जा सकता है। ऐसे में किसी भी खासकर छोटे दलों को अपने विधायकों को एकजुट और संभाले रखना चुनाव जीतने से भी ज्यादा मुश्किल काम हो जाता है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के परिणामों के बारे में जो संभावनाएं जताई जा रही है वह भाजपा व कांग्रेस के आस पास ही रहने की है। कोई भी 36 के पार जा सकेगा या नहीं सबसे ज्यादा सीटें जीतकर बड़ा दल बन सकेगा कि नहीं? यह सवाल भाजपा और कांग्रेस दोनों के ही सामने खड़ा है। अभी से अपने विधायकों की सुरक्षा को लेकर कांग्रेस चिंतित है। भाजपा नेता अभी से कई कांग्रेस के जिताऊ विधायकों के संपर्क में होने की बात कर रहे हैं। केंद्रीय नेताओं का राजधानी में जमावड़ा शुरू हो गया है। सत्ता झपटने के लिए प्लान ए,बी,सी बनाए जा रहे हैं। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि सरकार किसकी बनेगी और किसकी चलेगी या नहीं। सवाल जनता की अभिव्यक्ति के सम्मान का है जिसके तहत हमारा संविधान आम आदमी को वोट देने का अधिकार देता है। क्या उस जनादेश की सुरक्षा चुनावी रणनीति में संभव हो सकती है?

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