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रम्माणः परंपरा, आस्था और लोकनाट्य का जीवंत संगम

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  • अप्रैल में आयोजित होने वाले रम्माण में बदल जाता है पूरा गांव एक बड़े रंगमंच में
  • ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा-मुखौटों संग करते है पौराणिक-लोक कथाओं का मंचन
  • ढोल-दमाऊं की थाप, पारंपरिक गीत और नृत्य इस आयोजन को बना देते हैं जीवंत
  • परंपरा में आधुनिक तकनीक या मंच की जरूरत नहीं,पूरी तरह लोक शैली में संपन्न

देहरादून। उत्तराखंड के चमोली जिले के सलूर-डुंगरा गांव में हर साल मनाया जाने वाला रम्माण उत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण है। यह उत्सव गांव के आराध्य देवता भैरव को समर्पित होता है और स्थानीय लोगों की आस्था, सामाजिक एकता और परंपराओं को एक सूत्र में पिरोता है। रम्माण का आयोजन हर साल बैसाख महीने में किया जाता है, जब पूरा गांव एक बड़े रंगमंच में बदल जाता है।
रम्माण की सबसे बड़ी खासियत इसका लोकनाट्य स्वरूप है। इसमें गांव के लोग पारंपरिक वेशभूषा और मुखौटों के साथ विभिन्न पौराणिक और लोक कथाओं का मंचन करते हैं। रामायण, महाभारत के प्रसंगों के साथ-साथ स्थानीय कथाएं भी इसमें शामिल होती हैं। ढोल-दमाऊं की थाप, पारंपरिक गीत और नृत्य इस आयोजन को और भी जीवंत बना देते हैं। खास बात यह है कि इस पूरी परंपरा को निभाने के लिए किसी आधुनिक तकनीक या मंच की जरूरत नहीं होतीकृयह पूरी तरह लोक शैली में संपन्न होता है।
यह उत्सव सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश देने का भी एक सशक्त जरिया है। रम्माण के माध्यम से गांव के लोग अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हैं और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। इसमें हर वर्ग और उम्र के लोग भाग लेते हैं, जिससे सामुदायिक एकता और भाईचारे की भावना मजबूत होती है। इस आयोजन में अनुशासन और परंपराओं का विशेष ध्यान रखा जाता है, जो इसे और भी खास बनाता है।
रम्माण की इस अनूठी परंपरा को वैश्विक पहचान भी मिल चुकी है। इसे यूनेस्को की सूची में शामिल किया गया है, जो इसकी सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाता है। यह सम्मान न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे भारत के लिए गर्व की बात है। ऐसे समय में जब आधुनिकता के कारण लोक परंपराएं विलुप्त होती जा रही हैं, रम्माण जैसे उत्सव हमारी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत बनाए रखने का कार्य कर रहे हैं।

मुखौटों के पीछे की दुनिया
अप्रैल के महीने में जब पहाड़ों पर हरियाली छाने लगती है, तब सलूड़-डुंग्रा गांव के लोग रम्माण उत्सव की तैयारी करते हैं। यह उत्सव भगवान भूमियाल देवता को समर्पित है। इसमें गांव के लोग रामायण के प्रसंगों को एक नाटक के रूप में मंचित करते हैं, लेकिन यहाँ कोई संवाद नहीं होते। सब कुछ नृृत्य, संगीत और मुखौटों के जरिए व्यक्त किया जाता है। ग्रामीण इन मुखौटों को पहनकर नर्तक जब ढोल-दमाऊं की थाप पर थिरकते हैं, तो पूरा गांव भक्ति के रस में डूब जाता है। रम्माण में इस्तेमाल होने वाले मुखौटे लकड़ी के बने होते हैं और इनमें से कुछ तो सदियों पुराने हैं। गांव के लोगों का मानना है कि नृत्य के दौरान देवताओं की शक्ति वास्तव में उन नर्तकों में समा जाती है।

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