- प्रदेश के 17 राजनीतिक दलों पर गिरी गाज, सक्रिय सूची से बाहर
- जनादेश के अभाव में वक्त के साथ राजनीतिक स्मृति से हुए ओझल
- जनमुद्दों से जन्मी सियासी उम्मीदें ने चंद चुनावों के बाद ही तोड़ा दम
- राजनीति में कागजी पार्टियों का अंत और हो गया नए खेल की शुरु
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक खबर आई है। खबर छोटी लग सकती है, लेकिन उसके भीतर लोकतंत्र का एक बड़ा सवाल छिपा हुआ है। भारत निर्वाचन आयोग ने उत्तराखंड के 17 पंजीकृत राजनीतिक दलों को अपनी सक्रिय सूची से हटा दिया है। अब यह दल आगामी चुनाव नहीं लड़ सकेंगे, जब तक वह निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पूरी कर दोबारा मान्यता या पंजीकरण हासिल न कर लें। पहली नजर में लगेगा कि इससे क्या फर्क पड़ता है? चुनाव तो भाजपा और कांग्रेस ही लड़ती हैं। लेकिन जरा ठहरिए। सवाल केवल 17 दलों का नहीं है, सवाल यह है कि हमारे लोकतंत्र में राजनीतिक दल बनाना कितना आसान और उसे जीवित रखना कितना कठिन है। उत्तराखंड में पिछले दो दशकों में दर्जनों राजनीतिक दल बने। किसी ने पर्वतीय अस्मिता के नाम पर पार्टी बनाई, किसी ने पलायन के मुद्दे पर, किसी ने रोजगार के लिए और किसी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ। चुनाव आए, पोस्टर लगे, प्रेस कान्फ्रेंस हुई, सोशल मीडिया पर क्रांति भी हुई। लेकिन चुनाव खत्म होते ही अधिकांश दल भी मानो राजनीतिक स्मृति से गायब हो गए।
निर्वाचन आयोग का यह कदम बताता है कि केवल पार्टी का नाम रख लेने से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता। लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए सक्रिय संगठन, नियमित राजनीतिक गतिविधियां, कानूनी अनुपालन और जनता के बीच निरंतर उपस्थिति भी जरूरी होती है। लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी है। क्या यह केवल 17 दलों की विफलता है? या फिर यह उस राजनीतिक व्यवस्था की भी विफलता है जिसमें छोटे दलों के लिए जगह लगातार सिकुड़ती जा रही है? आज चुनाव लड़ना विचारों से ज्यादा संसाधनों का खेल बनता जा रहा है। बड़े दलों के पास करोड़ों का प्रचार, डिजिटल अभियान, विशाल संगठन और संसाधन हैं। दूसरी ओर, छोटे दल चुनाव आयोग के नियमों, वित्तीय रिपोर्टिंग, संगठनात्मक ढांचे और आर्थिक चुनौतियों के बीच दम तोड़ देते हैं। ऐसे में लोकतंत्र का मैदान बराबरी का नहीं रह जाता।
उत्तराखंड जैसे राज्य में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यह वही प्रदेश है जिसकी नींव जनआंदोलनों पर पड़ी थी। अलग राज्य की मांग किसी एक बड़ी पार्टी ने नहीं, बल्कि छोटे संगठनों, सामाजिक आंदोलनों और हजारों आम लोगों ने मिलकर उठाई थी। अगर छोटे राजनीतिक विकल्प धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगे, तो क्या भविष्य में नए विचारों को राजनीति में जगह मिल पाएगी? हालांकि, इसका मतलब यह भी नहीं कि केवल नाम के लिए राजनीतिक दल बने रहें। यदि कोई पार्टी वर्षों तक चुनाव नहीं लड़ती, अपना लेखा-जोखा जमा नहीं करती, संगठन नहीं चलाती और केवल कागजों पर मौजूद रहती है, तो निर्वाचन आयोग की कार्रवाई लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा मानी जाएगी। चुनाव आयोग का दायित्व केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था को पारदर्शी और नियमबद्ध बनाए रखना भी है। अब सवाल उत्तराखंड की राजनीति का है।
2027 का विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे करीब आ रहा है। भाजपा सत्ता बचाने की तैयारी में है। कांग्रेस वापसी का सपना देख रही है। क्षेत्रीय दल अपनी प्रासंगिकता साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे समय में 17 दलों का बाहर होना चुनावी गणित को भले बहुत बड़ा झटका न दे, लेकिन यह संकेत जरूर देता है कि आने वाले समय में चुनावी मुकाबला और अधिक सीमित हो सकता है। लोकतंत्र की खूबसूरती विकल्पों में होती है। विकल्प खत्म होने लगें, तो चुनाव तो होते हैं, लेकिन राजनीतिक विविधता कमजोर पड़ जाती है। इसलिए यह खबर केवल इतनी नहीं है कि 17 दल सूची से हट गए। असली खबर यह है कि उत्तराखंड की राजनीति में विचारों की जमीन कितनी बची है? क्या नए राजनीतिक प्रयोगों के लिए जगह है? क्या छोटे दल संगठन और जवाबदेही के साथ खुद को खड़ा कर पाएंगे? या फिर राजनीति कुछ बड़े दलों के बीच ही सिमटती चली जाएगी?
लोकतंत्र में चुनाव जीतना ही सब कुछ नहीं होता। लोकतंत्र का स्वास्थ्य इस बात से भी तय होता है कि कितनी आवाजें मैदान में हैं, कितने विचार जनता तक पहुंच रहे हैं और कितने राजनीतिक दल केवल चुनाव नहीं, समाज के सवालों को भी जिंदा रखे हुए हैं। सवाल 17 दलों के हटने का नहीं है। सवाल यह है कि उत्तराखंड की राजनीति में अगला नया विकल्प कौन बनेगा या फिर विकल्प बचेंगे भी या नहीं?




