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अध्यादेश! अध्यादेश और फिर अध्यादेश कब तक?

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  • मलिन बस्तियों के नियमितीकरण पर राजनीतिक घमासान जारी

देहरादून। निकाय चुनाव सर पर खड़े हैं और मलिन बस्तियों के नियमितिकरण का सवाल भी आज तक वहीं खड़ा है जहां 2016 में खड़ा था। भाजपा की प्रदेश सरकार द्वारा दो बार (2018 व 2021) अध्यादेश लाकर इसके समाधान का कोई प्रयास नहीं किए जाने से एक बार फिर अध्यादेश लाकर अगले 3 साल तक इस मामले को यथा स्थिति बनाए रखने के प्रयास किया जा रहे हैं। सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अध्यादेश के जरिए इन मलिन बस्तियों के अस्तित्व की सुरक्षा का जो प्रयास 2018 में किया था उससे इन बस्तियों को कब तक बचाया जा सकता है यह पहला सवाल है। तथा दूसरा सवाल यह है कि अध्यादेश का दांव विफल रहता है तो फिर सरकार क्या करेगी? और इन मलिन बस्तियों का भविष्य क्या होगा?
इस मुद्दे पर सरकार द्वारा की गई हीला हवाली पर जहां विपक्ष कांग्रेस ने कड़े तेवर अपना रखे हैं और वह सरकार पर कई गंभीर आरोप लगा रही है वहीं अब भाजपा के कुछ नेता भी सरकार पर मलिन बस्तियों के नियमितीकरण का रास्ता निकालने का दबाव बना रहे हैं। सरकार अब नए सिरे से सर्वे करने की बात कह कर अध्यादेश लाने की तैयारी में है सवाल यह है कि अध्यादेश कुछ अपरिहार्य स्थितियों में कुछ महीनों के लिए ही लाये जाते हैं तीन—तीन साल के लिए नहीं। लेकिन सरकार अध्यादेश पर अध्यादेश लाकर इस मुद्दे को सिर्फ टाल रही है ऐसा लगता है कि वह इसका कोई हल चाहती ही नहीं है। और यही बात विपक्ष द्वारा राजनीतिक मुद्दा बना लिया गया है।
2021 में लाये गए अध्यादेश की समय सीमा समाप्त हो चुकी है देखना होगा कि कल होने वाली कैबिनेट बैठक में सरकार क्या फिर अध्यादेश लाती है और लाती है तो उस पर हाई कोर्ट का और विपक्ष का रुख क्या रहता है। फिलहाल इस मुद्दे को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों की ही नजरे उन आठ लाख मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में लगी हुई है जो निकाय चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाने वाले हैं।

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