Home News Posts उत्तराखंड पड़्याल: पहाड़ की मिट्टी में बसी अपनत्व की मिसाल

पड़्याल: पहाड़ की मिट्टी में बसी अपनत्व की मिसाल

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  • एक-दूसरे के खेतों में बिना मजदूरी के मिलकर करते थे सभी लोग काम
    रोपाई व कटाई में गूंजते थे लोकगीत, मजबूत होता था सामाजिक रिश्ता
  • पलायन व बदलती जीवनशैली में खत्म हो गई है पहाड़ की पुरानी परंपरा

देहरादून। पहाड़ में जेठ की तपती दोपहरी हो या सावन की रिमझिम फुहार यहाँ के सीढ़ीदार खेत अकेले आदमी के बस की बात नहीं होते। जब पहाड़ की ऊबड़-खाबड़ ढलानों पर खेती की बात आती है तो यहा कि एक सदियों पुरानी प्रथा पड़्याल जो सामूहिक श्रम, लोक संस्कृति, समानता, पारंपरिक व्यंजन, सामाजिक मजबूती की मिशाल थी। आज के दौर में यह अब एक दिवास्वप्न बन गई है।
कुछ दिनों पहले पहाड़ की यात्रा पर था। खेतों में पानी और तपती दोपहर में खेतों में रौपाई करती कुछ महिलाएं दिखी। लंबे समय बाद पहाड़ जाना हुआ तो मैं भी उन खेतों में चला गया। खेतों में कार्य करती महिलाओं से सवाल-जवाब में पड्याल पर चर्चा की। तो उन्होंने पड़्याल का सरल अर्थ सामूहिक श्रमदान बताया और कहा कि आज यह सब कहां है। पहले जब गांव के किसी एक व्यक्ति के खेत में बुवाई, निराई या कटाई का बड़ा काम होता था, तो पूरा गांव अपनी कुदाल और दराती लेकर उसके खेत में उतर आता है। बदले में कोई पैसा नहीं लिया जाता, बल्कि एक अटूट विश्वास होता है कि आज हम तुम्हारे खेत में हैं, कल तुम हमारे साथ होगे।
महिलाओं ने बताया कि पड़्याल केवल श्रमदान नहीं, बल्कि पहाड़ी समाज की आत्मा थी। जब किसी परिवार के खेतों में रोपाई, गुड़ाई या कटाई का समय आता, तो गांव के लोग बिना किसी मजदूरी के मदद के लिए पहुंच जाते। बदले में वह परिवार भी दूसरे के खेतों में उसी तरह काम करता। इस परंपरा में न कोई हिसाब था और न कोई सौदा, केवल अपनापन और सहयोग था। रोपाई के दिनों में खेतों से आती महिलाओं की सामूहिक लोकगीतों की आवाजें पूरे गांव को जीवंत कर देती थीं। खेत काम का स्थान कम और मेल-मिलाप का केंद्र ज्यादा लगते थे। कोई पानी पिलाता, कोई बैलों को संभालता और कोई गीत गाते हुए थकान मिटाता। पहाड़ का कठिन जीवन इसी सामूहिक सहयोग से आसान बनता था।
बरसात के दिनों में रोपाई के समय खेतों में महिलाओं के लोकगीत गूंजते थे। पुरुष बैलों और हल के साथ खेत तैयार करते, जबकि महिलाएं कतार में धान रोपती थीं। खेतों में काम के साथ हंसी-मजाक और लोकसंस्कृति भी जीवित रहती थी। उत्तराखंड के पहाड़ों में प्रचलित पड़्याल प्रथा इसी एकजुटता का प्रतीक थी। लेकिन बदलते समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे कमजोर पड़ गई है।
आज के दौर में गांवों से पलायन बढ़ गया है और खेती बंजर होने लगी और आपसी मेलजोल की जगह भागदौड़ वाली जिंदगी ने ले ली। अब खेतों में जहां महिलाएं कार्य करती दिखती हैं वहां सामूहिक गीतों की आवाज कम और सन्नाटा ज्यादा सुनाई देता है। क्योंकि सभी महिलाओं ने अपने-अपने कानों पर मोबाइल की लीड लगाकर चुनके से गीतों का अपने आप आनंद लेती दिखती है। यही कारण है कि आज जब समाज में अकेलापन बढ़ रहा है।
महिलाएं बताती है कि जब पड़्याल जैसी परंपराएं थी उस समय लोगों में आपसी मेल-मिलाप, हसी-ठिठोली और पहाड़ का जीवन जीवंत था, लेकिन आज सब बदल गया है। पहले पहाड़ केवल प्राकृतिक सुंदरता का नाम नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन और आपसी सहयोग की संस्कृति का भी प्रतीक थे और पड्याल परंपरा केवल खेतों में काम करने की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि इंसानियत और सामाजिक एकता की मिसाल थी, लेकिन आज वह सब कहा।

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