October 2, 2026रामपुर तिराहा कांड की 32वीं बरसी स्मृति, संघर्ष और न्याय की अधूरी आस,उत्तराखंड आंदोलन का वह काला दिन तीन दशक बीतने के बाद भी यह घटना उत्तराखंड की सामूहिक स्मृति में जीवंत आंदोलनकारियों को रोकने के दौरान हिंसा ने पूरे आंदोलन को झकझोरा था देहरादून। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के सबसे पीड़ादायक अध्याय रामपुर तिराहा कांड को 32 वर्ष पूरे हो चुके हैं। तीन दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी यह घटना उत्तराखंड की सामूहिक स्मृति में उतनी ही जीवंत है। आंदोलनकारियों पर हुई कार्रवाई, महिलाओं के साथ कथित दुर्व्यवहार और गोलीकांड ने जिस पीड़ा को जन्म दिया, वह आज भी राज्य की राजनीति और सामाजिक चेतना का हिस्सा है। 32 वर्ष बाद न्याय की दिशा में हुई प्रगति को उम्मीद की शुरुआत माना जा रहा है, लेकिन इसे मंजिल मान लेना अभी जल्दबाजी होगी।रामपुर तिराहा केवल एक स्थान का नाम नहीं है। यह उस दौर की याद है जब अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर पहाड़ों से हजारों लोग दिल्ली की ओर कूच कर रहे थे। दो अक्टूबर 1994 की रात मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर आंदोलनकारियों को रोकने के दौरान हुई हिंसा ने पूरे आंदोलन को झकझोर दिया। इस घटना के बाद उत्तराखंड आंदोलन ने एक निर्णायक मोड़ लिया और राज्य गठन की मांग और अधिक मुखर हुई।उत्तराखंड का गठन वर्ष 2000 में हो गया, लेकिन रामपुर तिराहा से जुड़े मामलों में न्याय की प्रक्रिया लंबी खिंचती रही। यही वजह है कि हर वर्ष दो अक्टूबर के आसपास शहीदों को याद करते हुए एक सवाल फिर सामने आता है कि क्या जिन लोगों ने राज्य के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाया, उन्हें पूरा न्याय मिला? समय बीतने के साथ इस घटना के प्रत्यक्षदर्शियों और आंदोलनकारियों की संख्या कम हो रही है। नई पीढ़ी के सामने चुनौती है कि वह इस इतिहास को केवल एक सरकारी कार्यक्रम या श्रद्धांजलि दिवस तक सीमित न होने दे। रामपुर तिराहा की स्मृति को राजनीतिक भाषणों से आगे ले जाकर न्याय, जवाबदेही और इतिहास की सच्चाई से जोड़ना होगा।रामपुर तिराहा के संदर्भ में न्याय का अर्थ केवल दोषियों को सजा दिलाना नहीं है। न्याय का व्यापक अर्थ यह भी है कि उस रात क्या हुआ, किन परिस्थितियों में हुआ, किसकी क्या भूमिका थी और पीड़ितों को अब तक क्या मिला। इन सवालों का तथ्यात्मक और निष्पक्ष जवाब समाज के सामने आए। न्यायिक प्रक्रिया अपनी गति से चलती है, लेकिन लोकतांत्रिक समाज में संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न उससे भी बड़ा है। किसी भी आंदोलन में शामिल नागरिकों के अधिकारों की रक्षा राज्य की जिम्मेदारी होती है। यदि कहीं इन अधिकारों का उल्लंघन हुआ है तो उसकी जवाबदेही तय होना लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है।उत्तराखंड आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि देने का सबसे सार्थक तरीका केवल पुष्पांजलि नहीं हो सकता। असली श्रद्धांजलि तब होगी जब राज्य उस आंदोलन की मूल भावना को समझ। पारदर्शी शासन, जवाबदेही, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, गांवों की मजबूती और पहाड़ के लोगों के सम्मान की भावना। राज्य आंदोलन की एक बड़ी चिंता यह थी कि पहाड़ के लोगों की आवाज सत्ता के केंद्र तक पहुंचे। तीन दशक बाद भी पलायन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और गांवों के भविष्य से जुड़े सवाल मौजूद हैं। इसलिए रामपुर तिराहा की स्मृति आज के उत्तराखंड से भी सवाल करती है कि जिस राज्य के लिए बलिदान दिया गया, वह राज्य अपने मूल सवालों का कितना समाधान कर पाया।32 वर्ष बाद न्याय की प्रक्रिया में आगे बढ़ना निश्चित रूप से उम्मीद पैदा करता है। लेकिन न्याय की शुरुआत को अंतिम पड़ाव मान लेना उस संघर्ष की भावना के साथ न्याय नहीं होगा। अभी पीड़ित परिवारों की पीड़ा, लंबित कानूनी प्रक्रियाएं और इतिहास की पूरी सच्चाई समाज के सामने लाने का दायित्व बाकी है। रामपुर तिराहा को केवल कैलेंडर की एक तारीख न बनाया जाए। यह उत्तराखंड के लोकतांत्रिक इतिहास का वह अध्याय है जो हर पीढ़ी को यह याद दिलाता रहेगा कि अधिकारों की लड़ाई में नागरिकों की आवाज का सम्मान कितना जरूरी है। 32 वर्ष बाद न्याय की उम्मीद जगी है। अब जरूरत इस बात की है कि यह उम्मीद परिणाम तक पहुंचे। क्योंकि रामपुर तिराहा के शहीदों के प्रति हमारा कर्तव्य केवल उन्हें याद करना नहीं, बल्कि उनके संघर्ष से निकले सवालों का जवाब तलाशना भी है।