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रोते’ पहाड़ की सूनी ‘पगडंडियां’

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  • खाली आंगन, सूने खेत और लौटते कदमों का इंतजार करता पहाड़
  • पहाड़ के गांवों से शहरों की ओर बहता जीवन, पीछे छूट गया घर-आंगन

देहरादून। पहाड़ की सुबह आज भी उतनी ही खूबसूरत है। सूरज की पहली किरण जब सीढ़ीनुमा खेतों पर पड़ती है, तो लगता है मानो प्रकृति ने सोने की चादर बिछा दी हो। लेकिन आज इस चमक के पीछे एक गहरा सन्नाटा छिपा हैकृवीरान पगडंडियों का सन्नाटा, बंजर खेतों का सन्नाटा और खाली होते गांवों का सन्नाटा। समय का पहिया ऐसा घूमा कि जो रास्ते कभी घर की ओर ले जाते थे, आज वही पलायन की गवाही दे रहे हैं।
गांव के ऊपर वाले खेतों में अब हल की गूँज सुनाई नहीं देती। वह सीढ़ीदार खेत, जिन्हें पुरखों ने अपने पसीने से सींचकर सोना उगाने लायक बनाया था, आज बंजर पड़े हैं। वहां अब मंडुवा और झंगोरा नहीं, बल्कि जंगली घास उग आई है। पहाड़ के बंजर खेत सिर्फ खेती का संकट नहीं हैं, वह टूटते रिश्तों की कहानी भी हैं। जब गांव से युवा गए, तो खेत भी अकेले पड़ गए। पहले जिन खेतों में त्योहारों के गीत गूंजते थे, वहां अब बंदरों और जंगली सूअरों का आतंक है। मेहनत से बोई फसल रातों-रात उजड़ जाती है। धीरे-धीरे लोगों ने खेती छोड़ दी। शाम ढलते ही गांव का सन्नाटा और भारी हो जाता है। बंद घरों पर लगे ताले हवा में हिलते हैं। आंगन सूने हैं, चूल्हों का धुआं गायब है। गांव की बूढ़ी आंखें हर मोड़ पर किसी अपने के लौटने की राह देखती हैं।
पहाड़ के गांवों की वीरान पगडंडियां सिर्फ रास्ते नहीं हैं, बल्कि उन अधूरे सपनों की गवाह हैं जो रोजगार, शिक्षा और बेहतर जिंदगी की तलाश में शहरों की ओर निकल गए। बरसों पहले जिन खेतों में गेहूं और मंडुवा लहलहाता था, वहां अब झाड़ियां उग आई हैं। बंदरों और जंगली सूअरों ने खेती की बची उम्मीद भी तोड़ दी।
उत्तराखंड के पहाड़ों में आज सबसे बड़ा दर्द सिर्फ पलायन नहीं, बल्कि धीरे-धीरे खत्म होती गांव की आत्मा है। वीरान पगडंडियां और बंजर खेत एक खामोश सवाल बनकर आज खड़े हैं। आज भी हर साल गर्मियों में जब शहरों से कुछ लोग अपने गांव लौटते हैं, तो पगडंडियां फिर थोड़ी देर के लिए मुस्कुराती हैं। बच्चों के कदम पड़ते हैं, घरों के आंगन खुलते हैं और बूढ़ी आंखों में चमक लौट आती है। गांव जैसे फिर से जी उठता हैकृकुछ दिनों के लिए ही सही।

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