October 5, 2026चुनाव हारे तो संगठन पर सवाल उठेंगे, रणनीति पर सवाल उठेंगे, उम्मीदवारों पर सवाल उठेंगे और सबसे बढ़कर मतदाताओं के फैसले को समझना पड़ेगा। लेकिन अगर इन सवालों से बचना हो तो एक आसान रास्ता है कि हार का ठीकरा चुनाव आयोग के सिर फोड़ दीजिए। काकरोच जनता पार्टी के कर्ता-धर्ता अभिजीत दीपके का मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर दिया गया बयान इसी राजनीतिक प्रवृत्ति का उदाहरण है। महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली के चुनाव नतीजों को ज्ञानेश कुमार से जोड़ना अपने आप में ऐसा दावा है, जिसके सामने सबसे पहले कैलेंडर खड़ा हो जाता है। हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव 2024 में हुए थे, जबकि दिल्ली विधानसभा चुनाव का मतदान भी फरवरी 2025 में ज्ञानेश कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभालने से पहले हो चुका था। उन्होंने 19 फरवरी 2025 को पद संभाला। यानी जिन चुनावों का ठीकरा उनके सिर फोड़ा जा रहा है, उनमें से दो तो उनके कार्यकाल से पहले ही निपट चुके थे। तो सवाल सीधा है कि जिस अधिकारी ने चुनाव कराया ही नहीं, उसके सिर उस चुनाव की हार क्यों? राजनीति में आरोप लगाने की आजादी है, लेकिन तथ्यों को अपनी सुविधा के मुताबिक मोड़ने की आजादी नहीं हो सकती। चुनाव आयोग की आलोचना होनी चाहिए और कठोर होनी चाहिए, अगर किसी निर्णय, प्रक्रिया या कार्रवाई पर ठोस सवाल हैं। लेकिन आलोचना और राजनीतिक प्रहार के बीच एक महीन रेखा होती है। उस रेखा के पार जाते ही लोकतांत्रिक बहस तथ्य से हटकर आरोपों का अखाड़ा बन जाती है। विडंबना यह है कि चुनाव आयोग पर सवाल उठाने वाले दल और संगठन अक्सर उसी चुनावी प्रक्रिया से अपने पक्ष में मिले परिणामों को लोकतांत्रिक जनादेश बताते हैं। जीत मिली तो जनता की आवाज, हार मिली तो व्यवस्था संदिग्ध यह दोहरा पैमाना लोकतंत्र में भरोसा नहीं बढ़ाता। यह कहना भी गलत होगा कि चुनाव आयोग सवालों से परे है। मतदाता सूची, चुनावी पारदर्शिता, ईवीएम, एसआईआर और आयोग के फैसलों पर विपक्ष तथा नागरिक संगठनों को सवाल उठाने का पूरा अधिकार है। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में सवाल की ताकत उसके शोर से नहीं, उसके सबूत से तय होती है। अगर किसी चुनाव में गड़बड़ी का आरोप है तो बूथ बताइए, दस्तावेज सामने रखिए, आंकड़े दीजिए, प्रक्रिया में हुई कथित खामी बताइए और संवैधानिक रास्ते अपनाइए। सिर्फ इसलिए कि नतीजा मनमाफिक नहीं आया, पूरी चुनावी मशीनरी को कठघरे में खड़ा कर देना राजनीतिक तर्क नहीं, राजनीतिक सुविधा है और असली सवाल यहीं से शुरू होता हैकृक्या हर चुनावी हार के बाद राजनीतिक दल अपने भीतर झांकेंगे? क्या वे टिकट वितरण, संगठन की कमजोरी, स्थानीय मुद्दों से दूरी, गठबंधन की रणनीति और मतदाताओं के बदलते मिजाज पर बात करेंगे? या फिर हर बार कोई नया खलनायक खोज लिया जाएगा? लोकतंत्र में हार की जिम्मेदारी लेने का साहस भी उतना ही जरूरी है, जितना सत्ता से सवाल पूछने का साहस। चुनाव आयोग को जवाबदेह बनाना लोकतंत्र की जरूरत है। लेकिन चुनाव आयोग को राजनीतिक हार का पंचिंग बैग बना देना लोकतंत्र की सेहत के लिए खतरनाक है। संस्थाओं पर सवाल उठाइए, मगर उन्हें तथ्य के कटघरे में खड़ा कीजिए कि सुविधाजनक कहानी के कटघरे में नहीं। आखिरकार मतदाता का फैसला पसंद आए या न आए, लोकतंत्र में उससे बचने का रास्ता नहीं होता। हार का हिसाब जनता से पहले अपने संगठन के भीतर मांगना पड़ता है। क्योंकि हर हार के पीछे साजिश तलाशने वाली राजनीति एक दिन उस सबसे कठिन सवाल से बच नहीं सकतीकृअगर सबने आपके खिलाफ साजिश की, तो आपने अपनी तरफ से जीतने के लिए क्या किया?