June 17, 2026पर्यटकों और श्रद्धालुओं की गुंडागर्दी से आहत हो गई है देवभूमि चारधाम यात्रा और पर्यटन सीजन में बढ़ रहे दुर्व्यवहार के मामले स्थानीय के साथ मारपीट, अभद्रता और दबंगई की घटनाएं बढ़ी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो बढ़ा रहे सभी की चिंता सरकार और प्रशासन पर समय रहते सख्ती नहीं करने के आरोप देहरादून। सदियों से अपनी सरलता, सहनशीलता और अतिथि देवो भवः की परंपरा के लिए पहचाने जाने वाले पहाड़ के लोग आज भीतर ही भीतर रो रहे हैं, जिन पहाड़ों ने देश-दुनिया से आने वाले पर्यटकों और श्र(ालुओं का खुले दिल से स्वागत किया, वहीं अब कई जगहों पर स्थानीय लोग खुद को असुरक्षित और अपमानित महसूस कर रहे हैं। चारधाम यात्रा और पर्यटन सीजन के दौरान लगातार सामने आ रही घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि देवभूमि का धैर्य अब जवाब देने लगा है।उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में आए दिन ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां बाहरी राज्यों से आए कुछ पर्यटक और श्र(ालु स्थानीय लोगों के साथ अभद्र व्यवहार करते दिखाई दे रहे हैं। कहीं सड़क पर विवाद के दौरान मारपीट हो रही है तो कहीं होटल, ढाबों और टैक्सी चालकों के साथ बदसलूकी की घटनाएं सामने आ रही हैं। कई मामलों में महिलाओं और बुजुर्गों तक के साथ दुर्व्यवहार के आरोप लगे हैं।उत्तराखंड की संस्कृति हमेशा से मेहमानों के सम्मान की रही है। पहाड़ के लोग अपने सीमित संसाधनों के बावजूद यात्रियों की मदद के लिए आगे आते रहे हैं। आपदा हो या यात्रा का कठिन रास्ता, स्थानीय लोग हमेशा सहारा बनते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पर्यटन के बढ़ते दबाव के साथ व्यवहार में भी बदलाव देखने को मिला है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बड़ी संख्या में आने वाले कुछ पर्यटक पहाड़ को पर्यटन स्थल नहीं बल्कि मौज-मस्ती का मैदान समझने लगे हैं। शराब पीकर हुड़दंग, ट्रैफिक नियमों की अनदेखी, धार्मिक स्थलों की मर्यादा का उल्लंघन और स्थानीय लोगों के साथ अभद्रता जैसी घटनाएं आम होती जा रही हैं।चारधाम यात्रा को आस्था का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। हर साल लाखों श्र(ालु बाबा केदार, बदरीविशाल, हेमकुंड, गंगोत्री और यमुनोत्री के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में यात्रा मार्गों पर कई बार श्र(ालुओं और स्थानीय लोगों के बीच विवाद की खबरें सामने आई हैं। स्थानीय व्यापारियों, टैक्सी चालकों और होटल संचालकों का कहना है कि कुछ लोग यात्रा पर श्र(ा से कम और दबंगई के प्रदर्शन के लिए अधिक आते दिखाई देते हैं। मामूली बातों पर गाली-गलौज और मारपीट तक की नौबत आ जाती है।पहले ऐसी घटनाएं स्थानीय स्तर तक सीमित रह जाती थीं, लेकिन अब मोबाइल कैमरों और सोशल मीडिया ने पूरी तस्वीर सामने ला दी है। आए दिन ऐसे वीडियो वायरल हो रहे हैं जिनमें पर्यटकों और स्थानीय लोगों के बीच झगड़े, सड़क पर हंगामा और कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ती दिखाई देती हैं। इन वीडियो के बाद प्रदेशभर में यह बहस तेज हो गई है कि आखिर देवभूमि की गरिमा को बचाने के लिए क्या किया जा रहा है।स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकार पर्यटन और यात्रा के आंकड़ों को लेकर तो उत्साहित दिखाई देती है, लेकिन उससे जुड़ी चुनौतियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। पर्यटन बढ़ने के साथ कानून व्यवस्था, ट्रैफिक नियंत्रण और स्थानीय लोगों की सुरक्षा के लिए ठोस व्यवस्था की जरूरत है। कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त नियम नहीं बनाए गए तो स्थानीय लोगों में असंतोष बढ़ सकता है। उनका मानना है कि उत्तराखंड केवल पर्यटन उद्योग नहीं बल्कि लाखों लोगों का घर भी है और उनकी गरिमा तथा सुरक्षा सर्वाेच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।पर्यटन उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। हजारों परिवारों की आजीविका पर्यटन और यात्रा सीजन पर निर्भर है। यही कारण है कि कई बार अपमान और दुर्व्यवहार झेलने के बावजूद स्थानीय लोग खुलकर विरोध नहीं कर पाते। उन्हें डर रहता है कि कहीं उनकी रोजी-रोटी प्रभावित न हो जाए। लेकिन अब हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि पहाड़ की खामोशी के पीछे गहरा आक्रोश दिखाई देने लगा है।विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड में पर्यटन और तीर्थाटन का स्वागत होना चाहिए, लेकिन इसके साथ अनुशासन और जवाबदेही भी जरूरी है। जो लोग देवभूमि में आते हैं, उन्हें यहां की संस्कृति, परंपराओं और स्थानीय समाज का सम्मान करना होगा। उत्तराखंड केवल पहाड़, नदियां और मंदिर नहीं है। यह उन लोगों की भूमि है जिन्होंने सदियों से इन पहाड़ों को जिंदा रखा है। यदि स्थानीय लोगों का सम्मान और सुरक्षा खतरे में पड़ती है तो इसका असर केवल समाज पर नहीं बल्कि पर्यटन और तीर्थाटन की पूरी व्यवस्था पर पड़ेगा। आज पहाड़ मानो सरकार, प्रशासन और समाज से एक ही सवाल पूछ रहा है।
June 17, 2026नीट विवाद की भेंट चढ़ी देहरादून की एक होनहार जिंदगी नीट विवाद में घिरा सिस्टम, सवालों के घेरे में सरकार देहरादून की छात्रा की मौत ने खड़े किए कई सवाल सुसाइड नोट में अच्छी तैयारी और रैंक की उम्मीद सरकार की नाकामी और कीमत चुका रहे ‘बच्चे’ देहरादून। देहरादून में नीट की तैयारी कर रही छात्रा की मौत ने केंद्र सरकार और परीक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। बताया जा रहा है कि छात्रा ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि उसने नीट परीक्षा की अच्छी तैयारी की थी और उसे अच्छी रैंक आने की पूरी उम्मीद थी। लेकिन जिस परीक्षा व्यवस्था पर उसने भरोसा किया, वही व्यवस्था विवादों और अनिश्चितताओं में उलझ गई।यह घटना केवल एक छात्रा की मौत नहीं है, बल्कि उस सरकारी व्यवस्था पर सवाल है जो करोड़ों युवाओं के भविष्य की जिम्मेदारी संभालने का दावा करती है। जब छात्र सालों तक दिन-रात मेहनत करते हैं, परिवार अपनी जमा पूंजी बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करता है और फिर परीक्षा की निष्पक्षता पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं, तो सबसे बड़ा धोखा उन युवाओं के साथ होता है जिन्होंने ईमानदारी से मेहनत की होती है।देश में पिछले कुछ वर्षों में भर्ती परीक्षाओं से लेकर प्रवेश परीक्षाओं तक पेपर लीक की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। हर बार सरकार जांच, कार्रवाई और सुधार के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत नहीं बदलती। नीट जैसे देश के सबसे महत्वपूर्ण मेडिकल प्रवेश परीक्षा में भी विवाद सामने आना इस बात का प्रमाण है कि सरकार परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित और विश्वसनीय बनाने में पूरी तरह सफल नहीं रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि परीक्षा प्रणाली में सेंध लगती है तो उसकी सजा छात्रों को क्यों भुगतनी पड़ती है? आखिर उन अधिकारियों और एजेंसियों की जवाबदेही कब तय होगी जिनकी जिम्मेदारी परीक्षा को निष्पक्ष तरीके से संपन्न कराना है?देहरादून की छात्रा के सुसाइड नोट की पंक्तियांकृमैंने अच्छी तैयारी की थी, मुझे अच्छी रैंक आने की उम्मीद थीकृसरकारी दावों की पोल खोलती नजर आती हैं। यह केवल एक छात्रा की पीड़ा नहीं, बल्कि लाखों युवाओं की आवाज है जो आज यह महसूस कर रहे हैं कि उनकी मेहनत व्यवस्था की खामियों के सामने बेबस है। सरकार लगातार युवाओं को देश का भविष्य बताती है, लेकिन जब वही युवा परीक्षा विवादों, बेरोजगारी और अनिश्चितता से जूझ रहे हों तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर युवाओं की चिंता प्राथमिकता में क्यों नहीं है?बता दें कि नीट देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षाओं में से एक है, जिसमें हर साल लाखों विद्यार्थी डाक्टर बनने का सपना लेकर शामिल होते हैं। वर्ष 2026 में भी 22 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी थी, लेकिन पेपर लीक के आरोपों के बाद परीक्षा रद्द कर दी गई और दोबारा परीक्षा कराने का फैसला लिया गया। इस निर्णय ने छात्रों को मानसिक रूप से झकझोर दिया। महीनों की मेहनत, आर्थिक खर्च और भावनात्मक दबाव के बाद छात्रों को फिर उसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है। एक मेडिकल छात्र बनने का सपना केवल छात्र का नहीं होता, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदें उससे जुड़ी होती हैं। कई परिवार अपनी आर्थिक सीमाओं को पार कर बच्चों को कोचिंग और पढ़ाई के बेहतर अवसर उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में जब परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं या परीक्षा रद्द होती है, तो सबसे बड़ा आघात उन छात्रों को पहुंचता है जिन्होंने ईमानदारी से तैयारी की होती है। देहरादून की छात्रा के सुसाइड नोट में लिखे शब्दकृमैंने अच्छी तैयारी की थी, मुझे अच्छी रैंक की उम्मीद थी आज पूरे देश के छात्रों की पीड़ा को सामने ला रहे हैं। यह सवाल उठ रहा है कि आखिर छात्रों की मेहनत का मूल्य कौन चुकाएगा?किसी भी लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिकों का भरोसा बनाए रखना होती है। लेकिन जब करोड़ों छात्रों के भविष्य से जुड़ी परीक्षाओं पर बार-बार सवाल उठें, जब मेहनती छात्र निराशा में डूबने लगें और जब एक छात्रा अपने नोट में अपनी मेहनत और उम्मीदों का जिक्र करके दुनिया से विदा हो जाए, तब यह केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रह जाती, बल्कि शासन और व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बन जाती है। आज देश जानना चाहता है कि परीक्षा प्रणाली की खामियों की जिम्मेदारी कौन लेगा? कितने और युवाओं के सपने टूटेंगे? और आखिर कब सरकार ऐसी व्यवस्था दे पाएगी जिस पर छात्रों को पूरा भरोसा हो सके? जवाबदेही पर उठ रहे सवालसबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पेपर लीक हुआ तो जिम्मेदार कौन है? यदि परीक्षा की गोपनीयता नहीं बचाई जा सकती तो इसकी कीमत छात्रों को क्यों चुकानी पड़ रही है? अभिभावकों का कहना है कि हर बार जांच, कमेटी और कार्रवाई की बात होती है, लेकिन व्यवस्था में स्थायी सुधार दिखाई नहीं देता। पेपर लीक की घटनाएं अब अपवाद नहीं बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या बनती जा रही हैं। सरकार और एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौतीकेंद्र सरकार और परीक्षा एजेंसियों ने परीक्षा प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित बनाने तथा दोबारा परीक्षा के लिए अतिरिक्त इंतजाम करने की घोषणा की है। परीक्षा अवधि बढ़ाने, प्रश्न पुस्तिका में बदलाव और सुरक्षा उपायों को मजबूत करने जैसे कदम उठाए गए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन उपायों से छात्रों का टूटा हुआ भरोसा वापस आ पाएगा?
June 17, 2026रूद्रप्रयाग। गौरीकुंड क्षेत्र में नदी किनारे एक व्यक्ति का शव मिलने से क्षेत्र में सनसनी फैल गयी। सूचना मिलने पर पुलिस व एसडीआरएफ ने मौके पर पहुंच कर रेस्क्यू अभियान चलाते हुए उक्त शव को बरामद कर लिया है।जानकारी के अनुसार आज सुबह लगभग 5.30 बजे एक घोड़ा संचालक द्वारा सूचना दी गई कि गौरीकुंड छोटी पार्किंग के समीप नदी किनारे एक व्यक्ति मृत अवस्था में पड़ा हुआ है। सूचना प्राप्त होते ही एसडीआरएफ पोस्ट सोनप्रयाग की टीम द्वारा कोतवाली सोनप्रयाग को अवगत कराते हुए निरीक्षक अनिरुद्ध सिंह के नेतृत्व में तत्काल घटनास्थल के लिए प्रस्थान किया गया।एसडीआरएफ टीम घटनास्थल पर पहुँची, जहाँ एक अज्ञात व्यक्ति नदी किनारे मृत अवस्था में पाया गया। टीम द्वारा आवश्यक सावधानी बरतते हुए शव को स्ट्रेचर की सहायता से दुर्गम क्षेत्र से मुख्य सड़क तक पहुँचाया गया तथा अग्रिम वैधानिक कार्रवाई हेतु जिला पुलिस के सुपुर्द किया गया। मृतक अभी अज्ञात है। शिनाख्त की कार्यवाही की जा रही है।
June 17, 2026राहुल गांधी द्वारा जारी किया गया अपना एक 9 मिनट 23 सेकंड का वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है, उसे देश के उन तमाम नेताओं को जरुर देखना और सुनना चाहिए जो उन्हें नॉन सीरियस नेता से लेकर मूर्ख बताते या समझते रहे हैं। देश की जनता को भी उनके इस देश की राजनीति में तहलका मचा देने वाले भाषण को सुनना चाहिए क्योंकि इसमें देश के वर्तमान राजनीतिक हालात पर उनके द्वारा न सिर्फ पूरी बेबाकी के साथ अपनी बात कही गई है बल्कि संवैधानिक सिस्टम को सत्ता द्वारा संपूर्ण समाप्त करने की बात कही गई है। उनका कहना है कि विपक्ष को किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि वह लोकतांत्रिक तरीके से भाजपा को हराकर सत्ता से बाहर कर सकते हैं। अब देश में कोई भी चुनाव नहीं जीत सकता है क्योंकि चुनाव आयोग से लेकर अन्य सभी संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा कर लिया गया है न्यायपालिका से लेकर ब्यूरोक्रेट्स तक और मीडिया तक सभी सत्ता के अनुकूल काम कर रहे हैं यहां तक कि अब सोशल मीडिया पर अपनी बात कहना मुश्किल हो गया है। विपक्ष को इस भ्रम से बाहर निकालने की जरूरत है कि देश में लोकतंत्र है सरकार है जो संविधान के अनुसार काम करने पर बाध्य है। विपक्ष को अस्तित्वहीन बनाने के लिए उन्हें तोड़ा—मरोेड़ा जा रहा है। विपक्ष का अस्तित्वहीन होने का मतलब है उस जनता के अस्तित्व का समाप्त होना जिसने आपको वोट देकर चुना है। राहुल गांधी का कहना है कि जब न्याय की आस समाप्त हो चुकी है और चुनावी निष्पक्षता शेष नहीं बची तो सिर्फ एकजुट होकर सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरने और असहयोग आंदोलन छेड़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता है। जिसे वह रेसिस्टेंस का नाम देते हैं और वह आपसी मतभेद तथा निजी स्वार्थ को त्याग कर एकजुट होने का आह्वान करते हैं उनका कहना है कि विपक्ष के नेताओं के आलोचनाओं के जहर को पीने के लिए वह तैयार हैं साथ ही वह अपने इस आंदोलन को सत्य अहिंसा व करुणा के मूल्यों के साथ संवैधानिक दायरे में रहकर आगे बढ़ाने की बात कहते हैं। उन्होंने शायद यह बात इसलिए भी कही है क्योंकि सत्ता में बैठे लोग उन पर जेन जे के जरिए देश में अराजकता फैलाने का आरोप लगा चुके हैं तथा पेपर लीक और बेरोजगारी जैसे जो मुद्दे कॉकरोच जनता पार्टी की प्राथमिकता में है वह उनके आंदोलन की भी प्राथमिकता है। कई लोग तो दोनों को साथ मिलकर इस लड़ाई को लड़ने का सुझाव दे चुके हैं। राहुल गांधी अब अपनी राजनीतिक लड़ाई की लकीर खींच चुके हैं। लड़ाई लंबी चलेगी यह भी कह चुके हैं। राष्ट्रीय हित व सामाजिक सरोकारों की इस लड़ाई में इंडिया गठबंधन के कितने दल और नेता साथ होंगे या नहीं होंगे इस बात से उनका कोई सरोकार नहीं है वह यह कह जरूर रहे हैं कि सभी साथ आए तो लड़ाई आसान होगी वरना वह अपने कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं के साथ अकेले ही अंतिम सांस तक लड़ेंगे भले ही उनका सर काट दिया जाए। एनसीपी और टीएमसी तथा राजद जैसे दलों व शिवसेना को यह समझ आ चुका है कि उनका अब अकेले वजूद क्या बचा है। रामविलास पासवान की लोजपा और नीतीश की जदयू भी इसी कतार में है। 2027 में सपा को भी संभावित खतरे का आभास बंगाल के चुनावी नतीजो से हो चुका है। कांग्रेस न सिर्फ आर पार की लड़ाई का ऐलान कर चुकी है अपितु आज कोटा से अपना आंदोलन शुरू कर चुकी है। देश के सभी जाति व वर्ग के लोग जो भाजपा के कुशासन से मुक्ति चाहते हैं तथा देश के युवा और बेरोजगार जिनके सामने जीवन मरण के हालात हैं इस जंग में कौन—कौन किस हद तक उनके साथ आते हैं इसका पता उनकी चार जनसभाओं से हो जाएगा कि इस असहयोग आंदोलन से देश की राजनीति और सिस्टम बदलेगा या नहीं और यह आंदोलन जो राहुल ने शुरू किया है क्या बीजेपी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा सकेगा?
June 16, 2026कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी के दौरे से पहले भाजपा हुई सक्रिय नितिन नवीन के मसूरी पहुंचते ही तेज हुई राजनीतिक चर्चाएं भाजपा-कांग्रेस के कार्यक्रम से पहले बढ़ा राजनीतिक तापमान देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट अब साफ सुनाई देने लगी है। कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी के प्रस्तावित उत्तराखंड दौरे से ठीक पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नितिन नवीन का अचानक मसूरी पहुंचना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। भाजपा इसे संगठनात्मक कार्यक्रम और नियमित गतिविधि बता रही है, लेकिन राजनीतिक जानकार इसके समय और संदेश को लेकर कई मायने निकाल रहे हैं। मसूरी में नितिन नवीन की मौजूदगी ऐसे समय में सामने आई है जब कांग्रेस अपनी नई रणनीति के साथ संगठन को सक्रिय करने की तैयारी कर रही है। ऐसे में भाजपा अध्यक्ष का पहाड़ की राजनीति के केंद्र माने जाने वाले मसूरी में पहुंचना सियासी तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर चल रही है। पार्टी नेतृत्व बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में उत्साह बनाए रखने के लिए लगातार बैठकों और संवाद कार्यक्रमों पर जोर दे रहा है। सूत्रों के अनुसार भाजपा नेतृत्व आगामी चुनाव को देखते हुए संगठनात्मक ढांचे की समीक्षा, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और जनसंपर्क अभियानों पर विशेष फोकस कर रहा है। मसूरी दौरे को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।दूसरी ओर कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी का उत्तराखंड दौरा भी संगठनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी लंबे समय से सत्ता से बाहर है और 2027 के चुनाव को वापसी के अवसर के रूप में देख रही है। कांग्रेस नेतृत्व जिला और ब्लाक स्तर पर संगठन को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने और चुनावी रणनीति तैयार करने में जुटा है। प्रभारी के दौरे के दौरान संगठन की समीक्षा और आगामी राजनीतिक कार्यक्रमों पर चर्चा होने की संभावना है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मसूरी केवल पर्यटन नगरी ही नहीं बल्कि प्रदेश की राजनीति का भी महत्वपूर्ण केंद्र रही है। यहां होने वाली बैठकों और नेताओं की गतिविधियों को अक्सर बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जाता है। नितिन नवीन का मसूरी दौरा भाजपा कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने के साथ-साथ विपक्ष को यह संदेश देने का प्रयास भी माना जा रहा है कि पार्टी चुनावी तैयारी में किसी भी स्तर पर पीछे नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के केंद्रीय नेतृत्व की बढ़ती दिलचस्पी यह संकेत दे रही है कि उत्तराखंड का चुनाव राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों दल संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में लाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले महीनों में राष्ट्रीय नेताओं के दौरे और बढ़ेंगे तथा चुनावी गतिविधियां और तेज होंगी। अभी चुनाव में समय है, लेकिन नेताओं के दौरे, संगठनात्मक बैठकें और बढ़ती राजनीतिक सक्रियता यह साफ संकेत दे रही है कि उत्तराखंड में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। कांग्रेस प्रभारी के दौरे से पहले भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन की मसूरी मौजूदगी ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है और दोनों दलों के बीच चुनावी प्रतिस्पर्धा की झलक अभी से दिखाई देने लगी है।
June 16, 2026धारदार हथियार चले, कुछ घायल- बदरीनाथ हाईवे पर लगाया जाम चमोली। कर्णप्रयाग में बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर आज सुबह उस समय तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई जब यात्रा पर आए सिख समुदाय के कुछ यात्रियों और स्थानीय लोगों के बीच मामूली बात को लेकर विवाद हो गया। देखते ही देखते कहासुनी मारपीट में बदल गई और घटना ने हिंसक रूप ले लिया। जिसमें कुछ लोगों के घायल होने के समाचार है।जानकारी के अनुसार विवाद के दौरान कुछ यात्रियों द्वारा धारदार हथियार का इस्तेमाल किए जाने का आरोप है। घटना में एक स्थानीय व्यापारी गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसके सिर पर गंभीर चोट आई है। घायल को उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उसकी स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है।वहीं घटना की सूचना फैलते ही स्थानीय व्यापारियों और क्षेत्रवासियों में भारी आक्रोश फैल गया। गुस्साए लोगों ने पुलिस चौकी के बाहर प्रदर्शन शुरू कर दिया और बदरीनाथ हाईवे पर जाम लगा दिया। इसके चलते सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं और यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। स्थिति को बिगड़ता देख प्रशासन ने एहतियातन कई यात्रियों को सुरक्षित स्थानों पर रोक दिया। क्षेत्र में किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है। अधिकारी लगातार स्थानीय लोगों और व्यापारियों से वार्ता कर माहौल को शांत करने का प्रयास कर रहे हैं।घटना के बाद स्थानीय व्यापार मंडल और नागरिकों ने प्रशासन के समक्ष कई मांगें रखी हैं। धार्मिक यात्राओं के दौरान धारदार हथियारों और अन्य घातक शस्त्रों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। स्थानीय व्यापारी पर हमला करने वाले आरोपियों को तत्काल गिरफ्तार कर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए। यात्रा मार्गों और सीमावर्ती क्षेत्रों में सघन चेकिंग अभियान चलाया जाए ताकि कोई भी व्यक्ति हथियार लेकर देवभूमि में प्रवेश न कर सके। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर मौजूद हैं और स्थिति को नियंत्रित करने में जुटे हुए हैं। प्रशासन का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है तथा घटना में शामिल लोगों की पहचान कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। साथ ही हाईवे पर यातायात को जल्द सामान्य करने के प्रयास भी जारी हैं।