यूं तो इस देश का लोकतंत्र अनेक उतार चढ़ाव अब तक देख चुका है। चीन और पाकिस्तान के साथ युद्धों की विभिषिकाओ से लेकर आपातकाल की कटु यादो तथा सांप्रदायिक दंगों की आग में तपने वाले देश के लोकतंत्र पर जब जब संकट आया है वह और अधिक मजबूत होकर बाहर निकला है। लेकिन वर्तमान संकट बहुत ही अलग तरह का है। यह संकट देश की चुनावी प्रक्रिया को लेकर है जो अब इतना गंभीर हो चुका है कि जब चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह से अविश्वास के घेरे में आ चुकी है। तथा कोई भी संवैधानिक संस्था इस संकट का समाधान का रास्ता नहीं निकाल पा रही है। महाराष्ट्र के निर्वाचित विधायक अब इसके विकल्प के रूप में अगर विधायकी से इस्तीफा देने की ओर बढ़ रहे हैं तो यह देश की राजनीति के इतिहास में पहली बार ही होगा। जो निर्वाचन आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है। शिवसेना ठाकरे तथा एनसीपी शरद पवार गुट और कांग्रेस के विधायकों द्वारा इस पर गंभीरता से चिंतन किया जा रहा है क्योंकि इनमें से कोई भी दल और उसके नेता इन चुनावी नतीजो पर भरोसा नहीं कर रहे हैं। उनकी नजर में यह जनादेश नहीं मशीन का आदेश माना जा रहा है। जिसका लोकतंत्र में कोई मतलब नहीं होता है। 74 वर्षीय समाजसेवी बाबा आढ़व इस मुद्दे को लेकर अनशन पर है जो नेताओं को यह समझा रहे हैं कि जब किसी भी जुल्मों सितम को लेकर वह निराश व हताश नहीं है तो फिर आप क्यों हैरान परेशान है। जो कुछ गलत हो रहा है उसका साहस के साथ मुकाबला करो। अगर 50—100 विधायकों द्वारा चुनाव जीतने के बाद भी अपनी विधायकी को त्याग जाता है तो चुनाव आयुक्त जो किसी की भी आपत्तियों को बेकार की बातें बताकर हवा में उड़ाते रहे हैं ऐसी स्थिति में उनकी साख का दांव पर लगना स्वाभाविक है विपक्ष जैसे की मांग कर रहा है की एक बार वैलिट पेपर पर चुनाव करा कर देख लो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। अगर वैसा कुछ होता है तो उन्हें मुंह छुपाने की जगह भी नहीं मिलेगी। चुनाव आयोग को आज नहीं तो कल अपनी निष्पक्षता का सबूत देना ही पड़ेगा और अगर चुनाव आयोग द्वारा भाजपा के मोदी है तो मुमकिन है के नारे को सही साबित करने के लिए काम करना है तो निर्वाचन आयोग की कोई जरूरत ही नहीं रह जाती है। कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन के सभी घटक दल इस मुद्दे को निष्कर्ष तक पहुंचाये बिना नहीं रहेंगे फिलहाल उनके रुख से तो यही लगता है। लोकतंत्र का मतलब ही जनता का विश्वास है अगर देश की जनता किसी सत्ता या संस्था पर भरोसा नहीं रखती है तो लंबे समय तक बना रहना संभव नहीं है। बीते एक दशक में संवैधानिक संस्थाओं से लेकर सरकार तक और न्यायपालिका तक बहुत बड़ा बदलाव देखा गया है। खास बात यह है कि यह परिवर्तन सत्ता पक्ष को कहीं नजर नहीं आता है जबकि इस बड़े बदलाव को आम आदमी तक महसूस ही नहीं कर रहा है बल्कि इसे एक गंभीर भावी संकट मानता है। जनता के भरोसे को तोड़ना बहुत आसान काम है लेकिन भरोसा जीतना उतना ही कठिन है। इस भरोसे का टूटने का मतलब समाज का आक्रोश उभरना और समाज का बिखरना ही होता है। देखना होगा कि क्या विपक्ष अपनी कोशिशों में कामयाब हो पाएगा? यही आज का यक्ष प्रश्न है।




