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ये कहां आ गए हम?

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देश की राजनीति और हमारा लोकतंत्र आज कहां आकर खड़ा हो गया देश के राजनीतिक दलों और नेताओं के साथ अगर आम आदमी का भरोसा भी चुनाव और चुनाव आयोग से समाप्त हो जाएगा तो फिर हम किस लोकतंत्र की बात करने लायक रह जाएंगे? भले ही यह बात कुछ लोगों को बे सिर—पैर की लग रही हो लेकिन सच यही है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उसके बाद हरियाणा तथा महाराष्ट्र के चुनावों के बाद यह साफ हो चुका है कि इस तरह के मशीनी चुनाव का कोई औचित्य ही नहीं क्योंकि यह चुनाव जनता अभिमत नहीं है खास बात यह है कि इस बारे में चुनाव आयोग से लेकर न्यायपालिका तक विपक्ष के सवालों को सुनने को तैयार है और न उनके सवालों का कोई जवाब उनके पास है जो विपक्ष को संतुष्ट कर सके। चुनाव आयुक्त से अगर कोई सवाल करता है तो वह शायराना अंदाज में कहते हैं कि कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना। उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं है कि उनका काम लोगों के सवालों का जवाब देना है शेरो—शायरी करने का नहीं है। सत्ता में बैठे लोग अपनी मनमानी के आगे कुछ सोचने को तैयार नहीं है ऐसे में विपक्षी दलों के पास ऐसी चुनावी व्यवस्था व चुनाव के बहिष्कार के अलावा और कोई रास्ता ही क्या बच जाता है और अब इसकी नौबत आ चुकी है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अब इस मुद्दे पर गहन चिंतन कर रहा है उसकी सोच है कि इस तरह का चुनाव लड़ने से बेहतर है कि वह चुनाव लड़े ही नहीं। हालांकि अभी कांग्रेस ने ऐसी कोई औपचारिक घोषणा नहीं की है लेकिन जिस तरह महाराष्ट्र में विपक्ष विधायक की शपथ ग्रहण का बहिष्कार करने का ऐलान कर चुके हैं आने वाले दिनों में इंडिया ब्लॉक के घटक दल किसी भी चुनाव में भाग लेने से ही इंकार कर दें और फिर सिर्फ सत्ताधारी दल ही अकेले चुनाव लड़े और जीते तथा सत्ता में बना रहे विपक्ष की भूमिका ही समाप्त हो जाए? लेकिन इस स्थिति में अगर जनता आक्रामक हो जाती है तो देश में शिवाय अराजकता के कुछ शेष नहीं बचेगा। भारत की स्थिति भी श्रीलंका और पड़ोसी देश बांग्लादेश जैसी हो सकती है। यह कोई कपोल कल्पित बातें नहीं है। महाराष्ट्र चुनाव के नतीजो के बाद कई गांवों के लोग जो इन नतीजो पर भरोसा नहीं कर पा रहे थे अपने यहां मतदान का माक पोल करा कर सत्यता को समझने का प्रयास किया गया तो सभी के सामने चौंकाने वाले नतीजे आए हैं। अब पुलिस प्रशासन इस तरह के मॉक पोल को रोकने में जुटा हुआ है। अगर एक गांव से सैकड़ो की संख्या में इसे लेकर लोग अदालतों में पहुंच जाएंगे लाखों नहीं करोड़ों मुकदमे दायर हो जाएंगे चुनाव के बाद हरियाणा के जाट समुदाय के लोगों की नाराजगी तो यहां तक पहुंच चुकी है कि अगर सत्ता व सरकार ने उनसे उनका सब कुछ छीनना ही है तो वह सरकार के साथ नहीं है सरकार से वह अपने लिए अलग जाट लैंड देने की मांग कर रहे हैं। खास बात यह है कि सरकार में बैठे लोग अभी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि वह देश से हैं देश उनसे नहीं है तथा देश संविधान से चलता है उनकी तानाशाही से नहीं चलने वाला है। संविधान में लोकतंत्र को अगर इस तरह से परिभाषित किया गया है कि जनता के लिए जनता द्वारा चुनी गई सरकार से ही देश चलेगा तो जनता से ही देश चलेगा अगर किसी के द्वारा भी इस व्यवस्था को बदलने का प्रयास किया जाएगा तो जनता उसके खिलाफ खड़ी हो जाएगी और अब देश और देश की राजनीति में ऐसी ही कुछ स्थितियां पैदा होती जा रही है। राजनीति के शीर्ष पर बैठे लोग जो आजादी के अमृत काल का राग अलाप रहे हैं उन्होंने इस देश के लोकतंत्र और राजनीति को कहां लाकर खड़ा कर दिया है यह बात न सिर्फ विचारणीय है बल्कि अत्यंत ही गंभीर मुद्दा है।

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