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सरकार के गले पड़ी शिक्षा व्यवस्था

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क्या देश की सरकार और सिस्टम फेल हो चुका है? आज जब देश में होने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लगातार लीक हो रहे हैं तथा सीबीएसई की परीक्षाओं में तमाम तरह की धांधलियों के कारण सरकार को इसके पुर्ननिरीक्षण की बात की जा रही है तो इससे एक बात तो साफ है कि जब सरकार एक परीक्षा तक को ठीक से नहीं करा सकती है तो यह सरकार और सिस्टम का फेलियौर नहीं तो और क्या है। खास बात यह है कि अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए सत्ता में बैठे लोग बेहूदा तर्क देने के साथ इसे लेकर धरना प्रदर्शन करने वालों पर लाठियां बरसाने से लेकर उन्हें पाकिस्तानी बताने जैसे काम कर रहे है। यह मामला कोई साधारण समस्या नहीं है। सीबीएसई की परीक्षा में शामिल हुए 18 लाख तथा नीट में शामिल होने वाले 22 लाख परीक्षार्थियों के भविष्य का ही सवाल नहीं है। अगर पेपर लीक घटनाओं के इतिहास पर नजर डालें तो 2003 में कैट का पेपर लीक होने का मामला सामने आया था जिसमें रंजीत डॉन सहित कुछ लोगों पर कार्यवाही की गई थी इनमें से कुछ को सजा भी हुई थी लेकिन बीते 12 सालों में क्या—क्या नहीं हुआ, कैट और नीट के राज्य स्तर पर होने वाली परीक्षाओं के 80 से अधिक पेपर लीक अब तक हो चुके हैं। जिसके कारण 8 करोड़ से अधिक युवाओं का भविष्य चौपट हो चुका है। प्रतियोगी परीक्षाओं के बाद अब बोर्ड की परीक्षाओं में जिस स्तर की व्यापक धांधली का मामला सामने आया है उसने तो पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार द्वारा इस परीक्षा के लिए जिस नए सिस्टम को लागू किया गया था अब उसमें तकनीकी गलती के सिर पर सारी जिम्मेदारी डालकर सरकार फिर से आंसर सीटों के पुर्न निरीक्षण की बात कर रही है। खास बाकी है कि यह बेहद गंभीर मामला न सिर्फ अदालत तक पहुंच चुका है बल्कि देशभर के युवाओं द्वारा सिस्टम और सरकार के खिलाफ उग्र प्रदर्शनों का दौरा शुरू हो चुका है। जिससे सरकार की नींद हराम हो चुकी है। और तो और देश की शिक्षा व्यवस्था के इस कड़वे सच के सामने आने पर विश्व गुरु होने का प्रचार करने वाली सरकार की छवि भी तार—तार हो चुकी है। गार्डियन और बीबीसी जैसे अखबारों द्वारा भारत की शिक्षा प्रणाली की इस धांधली को लेकर छपी खबरों को पढ़कर इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है की विश्व स्तर पर किस तरह से देश की किरकिरी हो रही है। बीते 10—12 सालों में शिक्षा व्यवस्था के साथ जिस तरह से खिलवाड़ किया जा रहा है उसका पूरा सच सामने आने के बाद यह साफ हो चुका है कि युवाओं को रोजगार देने में नाकाम सरकार ने युवाओं को सड़कों पर लाकर खड़ा कर दिया है। और इसकी भरपाई नहीं की जा सकती है। सरकार की बेशर्मी इस बात से भी समझी जा सकती है कि लाखों युवाओं द्वारा हस्ताक्षरित मांग के बाद भी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा न लिया गया न उन्होंने इस्तीफा दिया? अदालत में पहुंचे इस मामले में जब सरकार से पूछा जाता है कि पेपर लीक क्यों हुआ तो जवाब दिया जाता है कि इस पर अब प्रधानमंत्री खुद नजर रखे हुए हैं। सवाल यह है कि प्रधानमंत्री तो बीते 12 सालों से नजर रखे हुए हैं फिर भी लगातार पेपर लीक हो रहे हैं। सवाल यह है कि पेपर लीक पर सही जवाब क्यों नहीं दिया जा रहा है। शिक्षा प्रणाली को जब माफिया के हवाले कर दिया गया है तो सरकार के पास बताने को बचता ही क्या है? अब देश के युवा भी इस बात को मान चुके हैं की खामियां तो पहले भी थी लेकिन उन खामियों को सुधारने के लिए कुछ किए जाने की बजाय उसका पूरा बंटाधार कर दिया गया। लोगों का कहना है कि शिक्षा व्यवस्था को निजीकरण में धकेलने और शिक्षा माफिया को लाभ पहुंचाने के लिए ऐसा किया गया है। खैर अब यह मुद्दा इतना बड़ा हो चुका है कि देश के युवा इस पर शांत बैठने वाले नहीं है। वह इस व्यवस्था को बदलकर ही दम लेंगे। सरकार की परेशानी यह नहीं है कि युवाओं का भविष्य खराब हो रहा है उसकी चिंता यह है कि उसके भविष्य का क्या होगा।

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