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जनाक्रोश के बीच फंसी सरकार

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मिथ्या प्रचार और भ्रम फैलाकर अथवा भय दिखाकर किसी झूठ को सच साबित किया जा सकता है? यह सवाल वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों के परिपेक्ष में अहम इसलिए हो जाते हैं क्योंकि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां एक ओर भारत पर बड़े आर्थिक संकट की बात कहकर लोगों से राष्ट्रवाद की दुहाई देकर आम लोगों से मुश्किल घड़ी में त्याग और बलिदान की अपील करते हैं तो वहीं दूसरी तरफ वह भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का दावा भी यह कहते हुए करते हैं कि भारत इस रास्ते पर अब आगे बढ़ चुका है और उसे कोई रोक नहीं सकता है। यही नहीं वह कुछ समय के अंतराल में विश्व भर के देशों को विकास में कई दशक पीछे चले जाने की बात भी कहते हैं जिसमें भारत भी शामिल है। वह विश्व राष्ट्रों से पारस्परिक सप्लाई चेन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत बनाने की अपील भी करते हैं भले ही उनके यह परस्पर विरोधी विचार लोगों के सर के ऊपर से चले जाने वाले हों और वह यह सोचने पर विवश हो कि प्रधानमंत्री आखिर कहना क्या चाहते हैं? उधर अब बीते कल नागपुर से संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा दिया गया वह बयान जिसमें उन्होंने कहा है कि भारत तो मजबूती से आगे बढ़ रहा है लेकिन विदेशी ताकतों द्वारा उसे पीछे धकेलने की कोशिशें की जा रही है जिन्हें वह षड्यंत्र की संज्ञा देते हुए कहते हैं कि ऐसी ताकतों का जवाब लाठी से ही दिया जा सकता है। सवाल यह है कि मोहन भागवत शक्ति बल से किन ताकतों को कुचलने की बात कर रहे हैं? क्या उनका इशारा उस विपक्ष की ओर है जिसने इन दिनों तमाम मुद्दों को लेकर सरकार की नाक में दम कर रखा है या फिर उन लोगों की तरफ है जो सत्ता से सवाल पूछने का साहस दिखा रहे हैं अथवा उन युवाओं की ओर है जो अपने आप को कॉकरोच बता रहे हैं तथा जिनको जेन जे के नाम से सोशल मीडिया पर प्रचारित प्रसारित किया जा रहा है। क्योंकि यह कॉकरोच जनता पार्टी विदेशी धरती से उपजी एक सोच है जिसने देश की सरकार और सिस्टम को झकझोरने का काम किया है। इन सभी बयानों और इसके निःतार्थ को भले ही सत्ता में बैठे लोग और संघ प्रमुख ही बेहतर समझ सकते हैं मगर बात चाहे जो भी रही हो। वर्तमान दौर में देश की राजनीतिक सत्ता और आम आदमी हर कोई एक मुश्किल दौर से ही गुजर रहा है। संकट चाहे आर्थिक हो या सामाजिक संकट तो है ही इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है। देश के युवाओं में अपने भविष्य को लेकर भयंकर चिंता है और उनकी समस्याओं का सरकार कोई सटीक समाधान दे पाने में विफल साबित हो रही है। इन युवाओं के सामने मरता क्या न करता जैसी स्थिति है। इन युवाओं को अगर लाठी का भय दिखा कर या उन्हें जेल में डालने का प्रयास किया गया तो ऐसी स्थिति में इनका विद्रोही होना भी संभव है। उधर महंगाई और भ्रष्टाचार की मार झेल रहे आम आदमी की समस्याओं का उसे कहीं भी अंत होता नहीं दिख रहा है। सरकार इसके लिए किसी भी तरह का बहाना करें लेकिन 12 साल के शासनकाल में अब उसका भी धैर्य जवाब देने लगा है। सरकार की गिरती लोकप्रियता और सिस्टम का ध्वस्त होना भले ही उसकी परेशानी को बेचैनी की हद तक ले जा चुका हो लेकिन इस अंतहीन समस्याओं के लिए लोग सरकार को ही जिम्मेदार मानते हैं।

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