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सत्ता की ‘राह’ में विरोधी लहर का ‘रोड़ा’

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  • लगातार दो कार्यकाल के बाद जनता के मूड को भांपने में जुटे राजनीतिक दल
  • विकास बनाम जन असंतोष की लड़ाई में बदल सकता है विधानसभा का चुनाव
  • इस पर मिथक टूटेगा या फिर मतदाता सत्ता परिवर्तन कर देगा सरकार को जवाब


देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी दूर दिखाई दे रहा हो, लेकिन राज्य की राजनीति में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। सत्तारूढ़ भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि एंटी-इंकम्बेंसी यानी सत्ता विरोधी लहर बन सकती है। वर्ष 2017 और 2022 में लगातार जीत हासिल करने वाली भाजपा तीसरी बार सत्ता में वापसी का सपना देख रही है, लेकिन इसके रास्ते में जनता की नाराजगी सबसे बड़ा रोड़ा बन सकती है।
राज्य गठन के बाद उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां मतदाता सत्ता परिवर्तन के लिए जाने जाते रहे हैं। हालांकि 2022 में भाजपा ने इस मिथक को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सरकार बनाई, लेकिन अब तीसरे कार्यकाल की दहलीज पर खड़ी पार्टी को जनता के सवालों का सामना करना पड़ सकता है।
भाजपा सरकार चारधाम आल वेदर रोड, )षिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना, निवेश सम्मेलन, समान नागरिक संहिता और धार्मिक पर्यटन जैसे बड़े मुद्दों को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। दूसरी ओर विपक्ष बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, पेयजल संकट, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विकास परियोजनाओं का लाभ आम जनता तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंचा तो एंटी-इंकम्बेंसी का असर चुनावी नतीजों में दिखाई दे सकता है। प्रदेश के पर्वतीय जिलों में पलायन आज भी बड़ा मुद्दा बना हुआ है। गांव खाली हो रहे हैं और युवाओं का रोजगार के लिए मैदानों व अन्य राज्यों की ओर जाना जारी है। चुनाव के दौरान विपक्ष इन मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर सत्ता विरोधी माहौल बनाने का प्रयास करेगा। कई क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं को लेकर स्थानीय असंतोष भी भाजपा के लिए चिंता का विषय बन सकता है। विशेष रूप से युवा मतदाताओं और बेरोजगारों की नाराजगी चुनावी समीकरण बदलने की क्षमता रखती है।
भाजपा ने पिछले वर्षों में कई मुख्यमंत्री बदले हैं। वर्तमान नेतृत्व को 2027 में जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता साबित करनी होगी। वहीं कांग्रेस भी मजबूत नेतृत्व और संगठन के दम पर सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस जनता के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने में सफल रहती है और भाजपा संगठन स्तर पर असंतोष को नियंत्रित नहीं कर पाती, तो एंटी-इंकम्बेंसी बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है।
2027 के चुनाव में पहली बार मतदान करने वाले युवाओं की बड़ी संख्या चुनावी परिणामों को प्रभावित करेगी। रोजगार, शिक्षा और डिजिटल अवसर उनके प्रमुख मुद्दे होंगे। वहीं महिला मतदाताओं के लिए महंगाई, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे विषय अहम रहेंगे। भाजपा के पास विकास कार्यों और केंद्र सरकार की योजनाओं का मजबूत आधार है, लेकिन जनता की बढ़ती अपेक्षाएं और स्थानीय मुद्दों पर असंतोष एंटी-इंकम्बेंसी को जन्म दे सकता है। ऐसे में 2027 का चुनाव विकास बनाम असंतोष की सीधी लड़ाई में बदलता दिखाई दे रहा है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उत्तराखंड की सत्ता का भविष्य विपक्ष की ताकत से ज्यादा इस बात पर निर्भर करेगा कि भाजपा जनता के बीच मौजूद नाराजगी को कितना कम कर पाती है। यही कारण है कि 2027 की चुनावी जंग में एंटी-इंकम्बेंसी सबसे बड़ा और निर्णायक फैक्टर बनकर उभर सकती है।

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