भले ही हरियाणा के चुनावी नतीजों को लेकर कांग्रेस भाजपा और केंद्रीय निर्वाचन आयोग पर सवाल खड़े कर रही हो लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस की हार की वजह खुद कांग्रेस ही है। इस हार के कारणों की सबसे बड़ी वजह कांग्रेस का अति उत्साह तो रहा ही है इसके साथ ही उसके द्वारा अपने गठबंधन सहयोगियों की उपेक्षा भी एक अहम कारण रहा है जहां आप के साथ गठबंधन में रहते हुए सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस का अड़ियल रवैया देखा गया जिसके बाद आप ने लगभग सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए भले ही आप का एक भी प्रत्याशी चुनाव न जीत सका हो लेकिन उसके प्रत्याशी कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने में सफल जरूर रहे हैं। उधर सपा को भी कांग्रेस ने इस चुनाव से अलग रखा। अगर सपा को 2—4 सीटें देकर साथ रखा गया होता तो उसे ओबीसी वोटो को अपनी ओर खींचने का अवसर जरूर मिला होता। अगर कांग्रेस हरियाणा में गठबंधन में चुनाव लड़ी होती तो परिणाम उसके पक्ष में रह सकते थे क्योंकि फिर इस चुनाव में अखिलेश जैसे बड़े ओबीसी नेता तो प्रचार करते दिखते ही साथ ही आप के आतिशी और मनीष तथा संजय सिंह जैसे नेता भी उसके साथ प्रचार करते। जिसका बड़ा प्रभाव पड़ता। लेकिन कांग्रेस अति आत्मविश्वास का शिकार होकर रह गई। कांग्रेस को यह लग रहा था कि वह अपने अकेले दम पर ही बाजी मार कर ले जाएगी क्योंकि हरियाणा के किसान जवान और महिलाओं में भारी नाराजगी है। कांग्रेस ने इस चुनाव को जनता के भरोसे छोड़ दिया उसे ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस को कार्यकर्ताओं और जमीन पर काम करने वाले संगठन की भी जरूरत नहीं है और सच भी यही है कि किसी भी राज्य में कांग्रेस के पास अपना कोई मजबूत सांगठनिक ढांचा नहीं है यही कारण है कि वह जहां भी अकेले चुनाव लड़ती है उसके हाथ असफलता ही रहती है। कांग्रेस ने यह मान लिया था कि तीसरी बार भाजपा किसी भी कीमत पर नहीं जीत सकती है उसका यह आकलन और सोच गलत थी। अब चुनावी नतीजों से यह साफ हो चुका है। हरियाणा के चुनावों में कांग्रेस की हार के परिणाम अभी से सामने आने लगे हैं शिवसेना के नेता संजय राउत का कहना है कि कांग्रेस को अगर अकेले ही चुनाव लड़ना है तो उसे साफ बता देना चाहिए वहीं अब दिल्ली के चुनावों के बारे में आम आदमी पार्टी ने यह घोषणा कर दी है कि वह दिल्ली का चुनाव अकेले ही लड़ेगी। और तो और नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला भी अब राहुल गांधी को नसीहतें दे रहे हैं। कांग्रेस की इस हार का कारण वह कांग्रेसी नेता भी हैं जो हरियाणा में कांग्रेस की जीत पक्का मानकर मतदान से पहले ही मुख्यमंत्री बनने को लेकर लड़ने झगड़ने लगे। कुमारी श्ौलजा ने चुनाव प्रचार से दूरी बनाई वहीं हुड्डा भी मुख्यमंत्री पद के लिए अलग—अलग प्रचार करते दिखे। अब हाय तौबा मचाने वाले इन कांग्रेस नेताओं को हरियाणा की यह हार वास्तव में एक बड़ा सबक है। यह अलग बात है कि वह इससे क्या सबक ले पाते हैं। लेकिन इस जीत को भाजपा के लिए एक संजीवनी से कम नहीं कहा जा सकता है वहीं कांग्रेस जो एक जीती हुई बाजी को हार चुकी है उसके लिए महाराष्ट्र व झारखंड की राह भी आसान नहीं रही है।



