- हाईवे से बाजार और घरों तक मंडराया खतरा, बारिश ने की परीक्षा लेनी शुरू
- कहीं हाईवे का हिस्सा धंस रहा तो कहीं सड़क के नीचे की जमीन खिसक रही
- बाजार व आबादी वाले इलाकों पर खतरा बढ़ा, कई जगह भवनों की नींव हिली
देहरादून। मानसून उत्तराखंड के लिए इस बार सिर्फ बारिश नहीं, बल्कि पहाड़ की कमजोर होती जमीन का इम्तिहान बनता जा रहा है। लगातार हो रही बारिश के बीच प्रदेश के कई हिस्सों में जमीन धंसने और भूस्खलन की घटनाएं सामने आ रही हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों से लेकर ग्रामीण सड़कों तक कहीं सड़क धंस रही है तो कहीं सड़क के नीचे की जमीन खिसक रही है। सबसे बड़ी चिंता उन बाजारों और आबादी वाले क्षेत्रों को लेकर है, जहां पहाड़ी ढलानों पर वर्षों से निर्माण होता आया है। सड़क कटने या जमीन धंसने का असर अब सिर्फ यातायात तक सीमित नहीं रह गया है। कई जगह आसपास बने भवनों की नींव पर भी खतरा मंडराने लगा है।
बारिश के दौरान पहाड़ी सड़कों पर दरारें पड़ना और सड़क का हिस्सा धंसना नया नहीं है। लेकिन लगातार सामने आ रही घटनाओं ने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पहाड़ों में सड़क निर्माण के दौरान भूगर्भीय स्थिति और जल निकासी को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है? जहां सड़क के किनारे पानी की निकासी की व्यवस्था कमजोर है, वहां बारिश का पानी पहाड़ के भीतर पहुंचकर मिट्टी और चट्टानों को कमजोर कर सकता है। इसके बाद ढलान का संतुलन बिगड़ते ही जमीन खिसकने लगती है। कई स्थानों पर सड़क को बचाने के लिए तत्काल डामर या मलबा डाल दिया जाता है। इससे रास्ता कुछ समय के लिए चलने लायक तो हो जाता है, लेकिन यदि मूल समस्या का उपचार नहीं हुआ तो अगली बारिश में वही संकट फिर सामने आ जाता है।
पहाड़ी कस्बों में बाजार अक्सर सड़क के दोनों ओर विकसित हुए हैं। सड़क के नीचे दुकानें और ऊपर मकान ऐसी तस्वीर उत्तराखंड के कई कस्बों में दिखाई देती है। ऐसे में सड़क का एक हिस्सा धंसता है तो उसका असर सिर्फ सड़क पर नहीं पड़ता। नीचे बनी दुकानों, मकानों और अन्य निर्माणों तक खतरा पहुंच जाता है। व्यापारियों की चिंता भी बढ़ रही है। सड़क बंद हुई तो बाजार का संपर्क टूटता है, ग्राहक नहीं पहुंचते और सामान की आपूर्ति प्रभावित होती है। वहीं भवनों के आसपास जमीन खिसकने लगे तो कारोबार के साथ लोगों की सुरक्षा का सवाल खड़ा हो जाता है। पहाड़ों में निर्माण की सबसे बड़ी चुनौती ढलान है। यदि पहाड़ काटकर सड़क या भवन बनाया गया है और उसके बाद पर्याप्त रिटेनिंग वॉल, ड्रेनेज और ढलान सुरक्षा नहीं की गई तो भारी बारिश में जोखिम बढ़ जाता है।
कई जगह जमीन में छोटी दरारें शुरुआत में मामूली दिखाई देती हैं। लेकिन लगातार बारिश के बाद यही दरारें बड़े भूस्खलन का संकेत बन सकती हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ लंबे समय से बारिश के मौसम में संवेदनशील ढलानों और भवनों की निगरानी की जरूरत बताते रहे हैं। हर बार पहाड़ टूटने के बाद सबसे आसान जवाब होता हैकृभारी बारिश के कारण भूस्खलन हुआ। लेकिन सवाल यह है कि क्या बारिश अकेली जिम्मेदार है? प्राकृतिक बारिश को रोका नहीं जा सकता। लेकिन बारिश के पानी को पहाड़ के भीतर जाने से रोकना, जल निकासी व्यवस्था मजबूत करना, संवेदनशील ढलानों की पहचान करना और निर्माण के दौरान भूगर्भीय जोखिम को समझना इंसानी जिम्मेदारी है। अगर हर मानसून में सड़क धंसे और हर बार हम बारिश को दोष देकर आगे बढ़ जाएं तो समस्या का समाधान कब होगा?
उत्तराखंड को सड़कें चाहिए। बेहतर कनेक्टिविटी चाहिए। पर्यटन और चारधाम यात्रा के लिए मजबूत बुनियादी ढांचा चाहिए। लेकिन सवाल सड़क बनाने का नहीं, सुरक्षित सड़क बनाने का है। पहाड़ को मैदान की तरह काटकर सड़क बनाना और फिर बारिश आने पर सुरक्षा कार्य शुरू करना दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता। जरूरत है कि संवेदनशील क्षेत्रों का वैज्ञानिक सर्वे हो। सड़क निर्माण से पहले भूगर्भीय अध्ययन हो। पानी की निकासी को प्राथमिकता दी जाए और पुराने भूस्खलन क्षेत्रों की नियमित निगरानी हो। बारिश थम जाएगी। धूप निकलेगी। सड़कें फिर सामान्य हो जाएंगी। बाजारों में रौनक लौट आएगी। लेकिन जो पहाड़ बारिश के दौरान कमजोर हुआ है, वह खतरा खत्म होने के बाद भी कमजोर रह सकता है। इसलिए अभी किए गए अस्थायी मरम्मत कार्यों के साथ-साथ दीर्घकालिक सुरक्षा योजना जरूरी है। क्योंकि उत्तराखंड में सवाल सिर्फ सड़क बचाने का नहीं है। सवाल सड़क के किनारे बसे बाजारों, दुकानों और घरों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा का भी है।
बारिश हर साल आएगी। पहाड़ भी अपनी जगह रहेगा। अब फैसला यह करना है कि विकास की हमारी रफ्तार पहाड़ की सहनशीलता के साथ चलेगी या हर मानसून हमें फिर उसी सवाल के सामने खड़ा करेगी कि सड़क बची या पहाड़? और अगर पहाड़ ही खिसक गया तो सड़क किसके लिए?




