भारत के संविधान में जिस धर्मनिरपेक्ष शब्द का इस्तेमाल उसकी मूल भावना के रूप में किया गया है उसका इस्तेमाल राजनीतिक दल और नेताओं द्वारा अपनी छवि को चमकाने के लिए किया जरूर गया है लेकिन सेक्यूलर समाज की संरचना से उनका सही मायने में कोई सरोकार रहा नहीं है। सर्वधर्म संभाव और जाति पाती तथा धर्म और छुआछूत जैसे तमाम शब्द आजादी के बाद राजनीतिक टूल की तरह इस्तेमाल किए जाते रहे हैं। कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्ष शब्द को अपनी राजनीति का आधार बनाकर सबसे अधिक समय तक सत्ता पर काबिज बने रहने में तो सफलता हासिल की गई मगर देश के समाज को उसका कोई फायदा नहीं हुआ न आर्थिक और न सामाजिक समानता और न वह आपसी भाईचारे की भावना हद तक मजबूत हो सकी जो राष्ट्र को एकजुटता की डोर में बांधे रखती। वही भाजपा जब हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र के रथ पर सवार होकर निकली तो वह भी सेकुलरिज्म के चक्रव्यूह को तोड़कर सत्ता के शीर्ष तक तो पहुंचने में कामयाब रही लेकिन देश के सभी जाति धर्म के लोगों को साथ लेकर चलने में वह असफल ही सिद्ध हुई है। बीच वाले दौर में कुछ समय के लिए भाजपा की कमंडल की राजनीति के साथ मंडल की राजनीति भी हावी होती दिखाई दी लेकिन उसका भी कोई वजूद ज्यादा समय तक टिका नहीं रहा। 2024 के चुनाव के पूर्व तक देश में जो हवा का रुख था उसमें एक बार फिर बड़ा बदलाव दिखा जब कांग्रेसी नेता हाथ में संविधान की किताब लेकर सामाजिक आर्थिक आधार पर समानता की बात करते हुए जातीय जनगणना की मांग करते दिखे। जिसकी जितनी भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी का विचार एक बार फिर जोर—जोर से सुनाई देने लगा। जिसने भाजपा के हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र के एजेंडें को ही हिला कर रख दिया। कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब लाल किले की प्राचीन से देशवासियों को संबोधित कर रहे थे तब उन्होंने यूनिफॉर्म सिविल कोड का जिक्र करते हुए एक नए शब्द का प्रयोग किया वह शब्द था सेक्यूलर कॉमन सिविल कोड। देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की जो बात लंबे समय से चल रही है उससे देश का हर नागरिक वाकिफ हैं। सरकार का कहना है कि एक राष्ट्र एक कानून के हिसाब से ही देश चलना चाहिए। प्रधानमंत्री का कहना है कि 77 सालों से देश कम्युनल सिविल कोड के आधार पर चल रहा है लेकिन अब समय आ गया है कि जब सेक्यूलर सिविल कोड के आधार पर देश चले। प्रधानमंत्री के इस सेकुलर कॉमन सिविल कोड पर चर्चा छिड़ना लाजमी है। क्या इसका मतलब देश से जाति धर्म के बीच के फासलों को खत्म करना है किसी की न कोई जाती होगी न धर्म और न किसी जाति धर्म के मुद्दों में सरकार का कोई हस्तक्षेप होगा। एक संविधान एक विधान एक देश एक जाति एक धर्म और एक चुनाव। अगर प्रधानमंत्री के इस सेक्यूलर कॉमन सिविल कोड का मतलब यही है तो दो सवाल सबसे अहम है पहले क्या भारत जैसे देश में इस तरह की व्यवस्था को सहज स्वीकार कर लिया जाएगा जहां बहुधर्म व जातियों का बोलबाला हमेशा से रहा है दूसरा सवाल यह है कि इसके पीछे प्रधानमंत्री की असल मंशा क्या है क्या इसके पीछे भी उनकी या बीजेपी का कोई छिपा हुआ एजेंडा है। राजनीति में कोई भी बयान या वक्तव्य बेवजह तो नहीं होता है।



