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महंगाई से हा—हाकार

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लोकसभा चुनाव के बाद भले ही देश में नई सरकार का गठन हो चुका है लेकिन देश के नेता और राजनीतिक दल अभी भी राजनीतिक उथल—पुथल के बीच अपने—अपने हित साधने में जुटे हुए हैं। वर्तमान मोदी सरकार कब तक अस्तित्व में बनी रह सकती है? वर्तमान राजनीति के विमर्श में यह सवाल सबसे अहम बना हुआ है देश में अब सरकार किसी की भी रहे आम आदमी के जीवन से जुड़ी समस्याओं का समाधान सभी के लिए अहम चुनौती रहने वाला है। चुनाव में इस बार महंगाई और बेरोजगारी जैसे दो अहम मुद्दे अत्यंत ही प्रभावी रहे। चुनाव निपटने के बाद भी यह मुद्दे उतने ही अधिक चर्चाओं में है। कारण साफ है जिस समस्या को 10 साल दरकिनार किया गया उसे गंभीर और गंभीर होना ही था। बीते एक साल की बात की जाए तो इस दौरान खाघ महंगाई दर में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हुई है। खाघान्न (अनाज) के दामों में 8.75 फीसदी, सब्जियों के दामों में 29.72 फीसदी, दालों के दाम में 16.07 फीसदी और दूध के दाम में 3.08 फीसदी की वृद्धि के साथ—साथ खाघ तेलों के दामों में 25 फीसदी के आसपास बढ़ोतरी हुई है। मार्च में जिस प्याज के दाम 20—25 रूपये प्रति किलो थे आज उसके दाम 50 रूपये प्रति किलो है तथा जो आलू 15—20 रुपए प्रति किलो था वह आज 30 से 40 रुपए प्रति किलो है। यह सिर्फ उदाहरण भर है आज बाजार में फल और सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं खास तौर पर गरीब और आम आदमी के जीवन पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा है यह तो सिर्फ आम आदमी ही जान सकता है। जो लोग पहले से ही गरीबी और गुरबत में जीवन बसर कर रहे थे इस महंगाई के बाद उनकी मुश्किलें कई गुना बढ़ गई है। चुनाव के दौरान इस मुद्दे को विपक्ष द्वारा शिद्दत के साथ उठाया गया था। उस समय प्रधानमंत्री मोदी का कहना था कि उनकी सरकार ने महंगाई को नियंत्रण में रखा हुआ है अन्यथा अगर कोई और सरकार होती तो इससे भी चार गुना अधिक महंगाई होती। मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में यही भाजपा के नेता सर पर सिलेंडर लेकर आए दिन प्रदर्शन करते दिखाई देते थे। उस समय रसोई गैस सिलेंडर की कीमत 400 रूपये के आस—पास थी उस समय इन नेताओं को महंगाई बहुत ज्यादा दिखाई देती थी और सत्ता में आने पर महंगाई को कम करने का भरोसा दिलाया जाता था। लेकिन अब उनके कार्यकाल में यही रसोई गैस सिलेंडर 1000 के पार चला गया लेकिन उन्हें यह महंगाई दिखाई नहीं दे रही है। कोई सरकार में बने रहने के तिकड़म में लगा है तो कोई सत्ता के जाने का इंतजार कर रहा है। बस एक आम आदमी है जो आज या तो रोजगार के लिए दर—दर की ठोकर खाता फिर रहा है या फिर इस महंगाई के दौर में दो जून की रोटी का जुगाड़ कैसे करें इसकी चिंता में सूखता जा रहा है। एक और अहम सवाल है मुफ्त की रेवड़ियंा बांटने का। खस्ता हाल अर्थव्यवस्था के इस दौर में कोई भी सरकार मुफ्त की रेवड़ियंा कब तक और कैसे बांट पाती है यह भी आने वाले समय का सवाल है जिसके आसरे राजनीति करने वाले आगे क्या करेंगे?

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