अव्यवस्थाओं पर सरकार से सवाल

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चारधाम यात्रा का प्रदेश वासियों और राज्य सरकार के लिए क्या महत्व है यह बताए जाने की जरूरत नहीं है। दो साल कोरोना काल में यात्रा बंद रहने के कारण लोगों को कितना संकट झेलना पड़ा यह सभी जानते हैं। लाखों लोगों की आजीविका चारधाम यात्रा पर निर्भर है। लेकिन इस बार चारधाम यात्रा पर जिस तरह अव्यवस्थाएं हावी रही हैं वह भी किसी से छिपा नहीं है। इस अव्यवस्था के कारण न सिर्फ सैकड़ों यात्रियों को अपनी जान गंवानी पड़ी है बल्कि बड़ी संख्या में घोड़े खच्चरों की जान भी गई है। सरकार इस बात को लेकर खुश है कि इस बार रिकॉर्ड श्रद्धालू चार धाम यात्रा पर आ रहे हैं। सिर्फ डेढ़ माह में 16 लाख श्रद्धालुओं का आना, बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है एक यात्रा सीजन में अब तक 22 लाख से अधिक लोग कभी चारधाम यात्रा पर नहीं आए हैं यात्रा सीजन में अभी 4 माह शेष हैं इन 4 माह में अगर उतने भी श्रद्धालु यात्रा पर आए जितने डेढ़ माह में आ चुके हैं तो यह संख्या 30 लाख से भी ऊपर जा सकती है जो पिछले सभी रिकॉर्डो से बहुत ऊपर होगी। लेकिन सवाल यह है कि यात्रा को लेकर शासन—प्रशासन स्तर पर यात्रा प्रबंधन पर ध्यान क्यों नहीं दिया जा सका है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अब सरकार से पूछा है कि अब तक कोई एसओपी क्यों जारी नहीं की गई। सरकार ने जब सभी धामों में एक दिन में जाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या तय की गई थी तो फिर इसके अनुपालन की कोई व्यवस्था क्यों नहीं की गई? केदारधाम में 13 हजार यात्रियों के सापेक्ष हर रोज 18 से 20 हजार तक यात्री पहुंचे वहीं बद्रीनाथ धाम में भी 16 हजार से ज्यादा यात्री हर रोज पहुंचे। बाकी धामों में भी यही हालात रही। ऐसी स्थिति में सरकार द्वारा तय किए गए मानकों का क्या अर्थ रह जाता है। विडंबना देखिए कि इस अव्यवस्था का खामियाजा यात्रियों को भोगना पड़ा। जिन यात्रियों को बिना दर्शन आधे रास्ते से वापस लौटना पड़ा उन्हें तो परेशान होना ही पड़ा वही रजिस्ट्रेशन की उचित व्यवस्था न होने के कारण उन्हें कई—कई दिन हरिद्वार और ऋषिकेश में रुकना पड़ा कई लोग तो हार थक कर बिना यात्रा पर गए ही वापस लौट गए। केदार धाम के पैदल मार्ग पर यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में घोड़े खच्चरों की मौत हो चुकी है। जनहित याचिका में 600 घोड़ों के मरने की बात कही गई है जबकि सरकारी आंकड़ों में 175 जानवरों की बात कही जा रही है। सवाल यह है कि जो बेजुबान जानवर अपने मालिक को मालामाल कर गए क्या उनकी जान की कोई कीमत नहीं थी। सच यह है कि सरकार ने भी इन घोड़े—खच्चरों से लाखों कमा लिए और उनके मालिकों ने भी कमा लिए लेकिन जान उनकी गई जो बेजुबान थे, बीमार थे और घायल थे। इनके इलाज और रखरखाव के लिए किसी ने भी कुछ नहीं किया? यात्रियों की संख्या सीमित न करने को लेकर आंदोलन तो सब कर सकते हैं लेकिन क्या सिर्फ अपनी निजी कमाई के बारे में ही सोचा जाना काफी है। सरकार को चाहिए कि वह चार धाम यात्रा की व्यवस्थाओं को और अधिक चुस्त—दुरुस्त बनाए।

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