सद्भाव के लिए हदें जरूरी

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आज अगर उत्तर प्रदेश में जुमे की नमाज पुलिस के कड़े पहरे में हुई तो यह बेवजह नहीं है। लंबे समय से न सिर्फ उत्तर प्रदेश में अपितु पूरे देश में जिस तरह के सांप्रदायिक तनाव की स्थितियां बनी हुई है वह किसी से भी छिपा नहीं है। कानपुर में हुआ दंगा इसकी ही परिणीति है। अभी हाल में ज्ञानवापी से लेकर लखनऊ की वीला वाली मस्जिद तथा ताजमहल से लेकर कुतुबमीनार तक को लेकर जो कुछ हुआ है और उसे लेकर नेताओं तथा मीडिया चैनलों पर जिस तरह की जिरह होती रही है उससे सांप्रदायिक उन्माद में जो उफान आया है वह किसी से छिपा नहीं है। भाजपा प्रवक्ता और प्रतिनिधियों से लेकर ओवैसी तक तमाम लोगों के खिलाफ देश के कोने—कोने में मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। भड़काऊ बयानों की इन दिनों बाढ़ आई हुई है। हिंदू और मुस्लिम पक्षकार एक दूसरे के खिलाफ जिस तरह का जहर उगल रहे हैं उससे नफरत की आग भड़कती जा रही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पहले 5 साल के कार्यकाल के बारे में यह दावा करते नजर आते थे कि राज्य में कहीं भी एक भी सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ लेकिन अब स्थितियां तेजी से बदल रही हैं स्थितियां बिल्कुल अलग है। कानपुर में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति के दौरे के समय जिस तरह की हिंसा फैलाने की कोशिशें हुई उसके पीछे बहुत कुछ ऐसा छुपा है जो गंभीर है। बात अगर उत्तराखंड की ही की जाए तो यहां भी एक समुदाय विशेष के लोगों की आबादी के अप्रत्याशित रूप से बढ़ने की बात कही जा रही है कौन है वह लोग कहां से आए उनका इतिहास भूगोल क्या है। वह यहां अवैध रूप से कैसे बस गए इसे लेकर अब धामी सरकार द्वारा सत्यापन अभियान चलाया जा रहा है आपने लव जिहाद की बात भले ही बहुत पहले सुनी हो लेकिन अब जमीन जिहाद का नाम भी इसमें जुड़ गया है। अवैध रूप से जमीनों पर काबिज इन लोगों पर शिकंजा कसने की तैयारी हो रही है। भले ही देश के कुछ मुसलमानों को इस बात की शिकायत हो कि शासन—प्रशासन उनके खिलाफ एकतरफा कार्रवाई कर रहा है। लेकिन यह सच नहीं है कार्रवाई सिर्फ वहीं हो रही है जहां कुछ न कुछ गलत हो रहा है। अभी धार्मिक स्थलों से अगर लाउडस्पीकर हटाए गए तो वह सिर्फ मस्जिदों या दरगाह से ही नहीं हटाए गए। मठों और मंदिरों से भी हटाए गए। कानपुर में पत्थर अगर मुसलमानों ने बरसाए तो क्या पुलिस इस जुर्म में हिंदुओं को गिरफ्तार करती? नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद बनी है और पूजा के लिए मंदिर। अगर मुसलमान सड़कों व पार्कों में नमाज पढ़ेंगे तो क्या यह उचित होगा या हिंदू कहीं भी सड़क पर बैठ कर पूजा करने लगे तो उन्हें इसकी इजाजत दी जा सकती है? धर्म व समाज तथा समुदाय सभी की अपनी हदें हैं और सभी हदों में रहे सभी की भलाई भी इसी में है।

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