नफरत की आग

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अभी 2024 के लोकसभा चुनाव में भले ही 8—9 माह का समय शेष सही लेकिन देश के कई हिस्सों में जिस तरह से सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं सामने आ रही हैं वह यह बताने के लिए काफी है कि चुनाव आने तक स्थिति क्या होने वाली है? बात सिर्फ जातीय हिंसा की आग में धधक रहे मणिपुर और धार्मिक संघर्ष की आग से झुलस रहे हरियाणा की नहीं है पूरे देश में जिस तरह का सांप्रदायिक टकराव का माहौल लंबे समय से तैयार होता दिख रहा है और समाज में नफरती बयार बह रही है वह अब उग्रता की हदें लाघने पर आमादा है। मणिपुर के जातीय संघर्ष ने इस राज्य में क्या स्थिति पैदा कर दी? इसे देश की सर्वाेच्च अदालत की उस टिप्पणी से भी समझा जा सकता है जिसमें कहा गया है कि राज्य में कानून व्यवस्था और संवैधानिक मशीनरी पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। किसी भी समाज या क्षेत्र में जब शासन—प्रशासन का नियंत्रण समाप्त हो जाता है तभी इस तरह की अराजक स्थितियां पैदा होती हैं। बात अगर हरियाणा के नूंह की करें तो यहां एक धार्मिक शोभायात्रा पर जिस तरह से एक सुनियोजित ढंग से हमला किया गया वह किसी आतंकी हमले से कम नहीं है। इस हमले के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया हुई और एक धार्मिक स्थल को आग लगा दी गई और अब इसकी आग गुरु ग्राम, फरीदाबाद तथा पलवल तक जा पहुंची वह यह बताने के लिए काफी है कि यह नफरती आग आसानी से बुझने वाली नहीं है। अब तक इस हिंसा में 6 लोग मारे जा चुके हैं 60 घायल है और सैकड़ों वाहन व दुकानें आग के हवाले की जा चुकी हैं। पहले बात नेताओं के नफरती बयानों की होती थी जिसे लाख कोशिशों के बाद भी नहीं रोका जा सका। फिर लैंड जिहाद और लव जिहाद के मुद्दों को हवा दी गई और धार्मिक अतिक्रमण हटाने के नाम पर और गौ रक्षा के टकराव और तनाव पैदा किया गया। कभी हिजाब को लेकर तो कभी मदरसों को लेकर कभी तीन तलाक को लेकर कभी सीएए के मुद्दे को लेकर धरना प्रदर्शन और आंदोलन लंबे समय से चले आ रहे हैं। दिल्ली में अब तक दो बार बड़े सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं। जिनमें कई लोग जान गवा चुके हैं और संपत्तियों को बड़ा नुकसान पहुंचा है। विपक्ष के नेता सत्ता पक्ष पर देश में नफरत फैलाने का आरोप लगाते रहे हैं। आज अगर देश में नफरत का जहर फैल रहा है तो इसके लिए देश के नेताओं के वह नफरती बयान और सांप्रदायिक बयान ही जिम्मेवार हैं। कांग्रेसी नेता राहुल गांधी ने केरल से कश्मीर तक की सांप्रदायिक सद्भाव यात्रा की। जिसे भारत जोड़ो यात्रा का नाम दिया गया था इस यात्रा के दौरान उन्होंने अपनी राजनीति को मोहब्बत की दुकान बताया और विपक्ष भाजपा को नफरती राजनीति करने के लिए कटघरे में खड़ा किया गया। भाजपा का कहना है कि देश धर्म संप्रदाय के विधान से नहीं संविधान से चलेगा? यह ठीक बात है कि देश संविधान से ही चलना चाहिए जब भाजपा सत्ता में है तो उसकी जिम्मेदारी है कि वह मणिपुर और हरियाणा में संवैधानिक व्यवस्था को दुरुस्त करें जिसके बारे में सुप्रीम कोर्ट भी यह मान रहा है कि यहां संवैधानिक व्यवस्था और कानून व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। वोटों के केंद्रीकरण के लिए देश और समाज को जिस नफरती आग में झोंकने का काम किया जा रहा है वह न राष्ट्रहित में है और न समाज हित में। यह बात सभी दलों के नेताओं को सोचने की जरूरत है।

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