नए भारत की नई दिशा

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सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास के नारे के साथ भाजपा अब अपने 9 साल के शासन में हार्ड हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के घोड़े पर सवार हो चुकी है। बीते 9 सालों में उसने अपने सांगठनिक ढांचे को इतना मजबूत बना लिया है कि उसके नेताओं का आत्मविश्वास अपने चरम पर पहुंच चुका है। लव जिहाद और लैंड जिहाद जैसी नीतियों के कारण देश भर में वर्तमान समय में जो सामाजिक टकराव और विभाजन की जो सीमा रेखाएं खिंचती दिख रही है अब उसके परिणामों की भी उसे कोई चिंता नहीं है। भले ही उसके नारे में सबका साथ को सर्वाेच्च प्राथमिकता पर रखा गया हो लेकिन अब उसे विश्वास हो गया है कि उसको भले ही किसी जाति और संप्रदाय विशेष का समर्थन मिले न मिले उसके इस विजय रथ को कोई नहीं रोक सकेगा। लव जिहाद और लैंड जिहाद जो दो बातें कुछ ही महीनों में खबरों की सुर्खियों में आए हैं यह अनायास ही नहीं हुआ है। गुजरात के जूनागढ़ से एक मजार को हटाए जाने के विरोध में जिस तरह का उग्र प्रदर्शन और पुलिस के साथ टकराव की जो घटना सामने आई है वह सिर्फ इस बात का प्रमाण नहीं है कि यह मुद्दा कितना गंभीर हो चुका है बल्कि हवा के उस रूख को भी बताता है की हवा किस दिशा में बह रही है। इस विरोध प्रदर्शन के दौरान जिस तरह से धार्मिक नारे लगाए गए और पुलिस पर पथराव किया गया और पुलिस चौकी को तहस—नहस किया गया, वह यही बताता है कि आक्रोश बेहिसाब है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में तो इन मुद्दों को लेकर हिंदू और मुस्लिमों के धर्मगुरुओं और संतों द्वारा आर पार की लड़ाई के लिए आस्तीनें ऊपर चढ़ाई जा रही हैं। जनांदोलन को उस मुकाम तक पहुंचाया जा चुका है जहां समस्या के समाधान की बात भी बेमानी हो जाती है। इस सामाजिक समस्या का पैदा होना और फिर देखते ही देखते कोरोना की तरह उग्र रूप ले लेना स्वाभाविक नहीं है। न ही यह समस्या अचानक पैदा हुई है और न पहली बार देखी समझी गई है। इस समस्या को तूल दिए जाने के पीछे क्या कारण है, राजनीतिक तुष्टीकरण की वह राजनीति जो बीते कुछ समय में चलन में आई है या फिर आम आदमी का ध्यान उन समस्याओं से हटाने का प्रयास जिनसे आम आदमी इन दिनों जूझ रहा है। इसे समझ पाना थोड़ा मुश्किल जरूर है लेकिन असंभव नहीं है। 2024 का आम चुनाव अब बहुत दूर नहीं है। इस चुनाव से न सिर्फ देश के लोकतंत्र की दिशा और दशा तय होनी है अपितु भाजपा और अन्य विपक्षी दलों के भविष्य का भी फैसला होना है। जिसे लेकर तमाम विपक्षी दलों के नेता पटना में जमा हुए हैं। यूं तो देश के लोकतंत्र और राजनीति ने हर दौर में अनेक उतार—चढ़ाव देखे हैं सबसे लंबे समय तक देश की केंद्रीय सत्ता पर काबिज रहने वाली और सबसे बड़ी तथा पुरानी राजनीतिक पार्टी कहे जाने वाली कांग्रेस आज राजनीति के हाशिए पर है और 2 लोकसभा सीटों से अपना राजनीतिक सफर शुरू करने वाली भाजपा जीत की हैट्रिक लगाने को तत्पर है और आज वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित हो चुकी है। 70 के दशक में आपातकाल का दंश झेलने वाला लोकतंत्र आज किस रूप रंग में हमारे सामने है तथा इसी दौर से शुरू हुई देश की गठबंधन राजनीति जिसने कांग्रेस और स्व. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सत्ता की चूले हिला दी, से लेकर कांग्रेस की सत्ता में फिर प्रचंड बहुमत के साथ वापसी तक तथा इंदिरा गांधी की हत्या तथा 1992 में अयोध्या की बाबरी मस्जिद ढहाये जाने के बाद हुए राष्ट्रव्यापी हिंसक आंदोलनों तक इस देश के लोगों ने बहुत कुछ देखा और समझा है। लेकिन अब यह नए दौर का नया भारत है और इस नए दौर के नए भारत में सब कुछ नया है। नए दौर की नई राजनीति किस ओर जा रही है क्या नए मापदंड निर्धारित करती है। यह आगामी चुनाव परिणामों के बाद ही तय होगा लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि जब लोकतंत्र ने ऐसे समय देखे तब देश का लोकतंत्र और अधिक सशक्त बनकर उभरा है इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि नेताओं द्वारा हार्ड और सॉफ्ट हिंदुत्व तथा राष्ट्रवाद और देशभक्ति और राष्ट्रद्रोह की बातें राजनीति के केंद्र में लाई गई हैं वह देश के लोकतंत्र को और अधिक सशक्त बनाएगी। यही अपेक्षा की जानी चाहिए।

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