देव संस्कृति की रक्षा का सवाल

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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जब से सत्ता की कमान संभाली है तब से लगातार वह कहते आए हैं कि देव भूमि की देव संस्कृति को खराब होने से बचाने के लिए वह कुछ भी करने से नहीं हिचकेंगे। चाहे बात अवैध धार्मिक स्थलों की आड़ में होने वाले अतिक्रमण की हो या फिर बाहरी राज्य के लोगों द्वारा जमीनों की खरीद—फरोख्त करने या कारोबार करने वालों की। उन्होंने अभी बाहरी लोगों द्वारा जमीन खरीद—फरोख्त के मामलों में यह फैसला सुनाया था कि बिना जिलाधिकारी की मंजूरी और सत्यापन के अब कोई भी बाहरी व्यक्ति उत्तराखंड में जमीन नहीं खरीद सकेगा। उनका तर्क है कि बाहरी राज्यों से आने वाले अराजक तत्वों द्वारा प्रदेश का माहौल खराब किया जा रहा है। इसलिए उनके चरित्र और चाल चलन की जानकारी के बाद ही उन्हें जमीन खरीदने की इजाजत दी जाएगी उनका साफ कहना है कि कौन किस मंशा से यहां आकर रह रहा है या बसना चाहता है यह जानकारी जरूरी है। 250 वर्ग मीटर जमीन घर बनाने के लिए खरीदने पर भले ही उन्होंने पाबंदी न लगाई हो लेकिन आपराधिक या संदिग्ध व्यक्तियों के जमीन खरीदने पर इससे अंकुश लगाने की बात जरूर की है। अब उनका जो ताजा फैसला आया है वह मेहनत मजदूरी कर रोजगार कमाने बाहर से आए लोगों के बारे में है जिसमें उन्होंने कहा है कि चारधाम यात्रा मार्गों पर काम करने वाले सभी लोगों का सत्यापन किया जाए चाहे वह सब्जी और फलों की ठेली लगाने वाला हो या फिर चाय पकौड़ी और परचून की दुकान चलाने वाला। सवाल यह है कि छोटे—मोटे कारोबार के जरिए रोजगार कमाने वाला कोई व्यक्ति क्या यहां आकर बड़ा अपराध करेगा? इन दिनों अवैध धार्मिक स्थलों या संरचनाओं के खिलाफ पूरे राज्य में एक बड़ा अभियान चलाया जा रहा है सरकार द्वारा चलाए जा रहे इस अभियान से पूर्व जो सर्वे कराया गया उसमें यह साफ हो गया है कि राज्य में व्यापक स्तर पर धार्मिक अतिक्रमण किया गया है। राज्य में अब तक साढे़ तीन सौ से अधिक मजारों को ध्वस्त किया जा चुका है लेकिन सरकार की यह कार्यवाही भी सवालों के घेरे में है जिसका कारण है इस कार्रवाई का एकतरफा होना। राज्य में अनेक मठ मंदिर और अन्य धार्मिक संरचनाएं है जो अवैध रूप से जमीन पर कब्जा कर बनाई गई हैं, जिनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है। अभी हरिद्वार में एक हनुमान मंदिर तथा एक अन्य देवी मंदिर पर जब प्रशासन ने नोटिस चस्पा किया तो इसके विरोध में हरिद्वार का संत समाज उग्र विरोध पर उतारू हो गया। मुख्यमंत्री जिस जनसंाख्यीय असंतुलन की बात कहकर बाहरी और भीतरी के मुद्दे को आगे बढ़ा रहे हैं उसके मद्देनजर संतुलन अति आवश्यक है। राज्य बनने के बाद राज्य में जो विकास कार्य आगे बढ़े हैं उनमें बाहरी राज्य के लोगों की भूमिका भी अहम रही है उदाहरण के तौर पर देखें तो भवन निर्माण कार्यों में तमाम लेबर व अन्य कार्य करने वाले लोग बिहार और दूसरे राज्य के लोग ही हैं। चारधाम ऑल वेदर रोड और ऋषिकेश—कर्णप्रयाग रेलवे लाइन पर काम करने वाले भी दूसरे राज्य के लोग ही हैं। राज्य में जमीनों के जिस कारोबार को उत्कर्ष पर आज देख रहे हैं वह भी बाहरी लोगों की बदौलत ही है। राज्य के लोगों के पास इस कारोबार के लिए पूंजी थी ही कहां? राज्य की देव संस्कृति को बनाए रखना जितना जरूरी है उतना ही जरूरी बाहरी लोगों का सहयोग भी। उत्तराखंड को अगर पर्यटन राज्य बनाना है तो देशभर के लोगों के साथ समन्वय बनाकर ही यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। देव संस्कृति की रक्षा को राजनीति का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।

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