यात्रियों की जान से खिलवाड़

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चार धाम यात्रा की तैयारियों को लेकर ढोल पीटने वाली धामी सरकार और खुद अपनी ही पीठ थपथपाने वाले अधिकारी अब यह समझ नहीं पा रहे हैं कि करे तो क्या करें? अभी चार धाम यात्रा को शुरू हुए एक सप्ताह ही हुआ है कि अव्यवस्थाओं का शोर दिल्ली तक पहुंच गया है। प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा चार धाम यात्रा के दौरान हो रही मौतों पर रिपोर्ट क्या तलब की, शासन—प्रशासन में हड़कंप मच गया। सरकार की लापरवाही अगर यात्रियों की जान पर भारी पड़ रही है तो इस पर संज्ञान लिया जाना चाहिए। दरअसल सूबे की सरकार चार धाम यात्रा और पर्यटन से अपनी आमदनी की बात तो सोचती है लेकिन व्यवसायियों की तरह वह भी उन्हें घटिया सुविधाएं देकर अधिक मुनाफा कमाने में जुटी हुई है। चार धाम यात्रा मार्गों पर और धामों में जन सुविधाओं की अगर रियलिटी टेस्ट की जाए तो सरकार के दावे झूठ के सिवाय कुछ नहीं दिखाई देते हैं। श्रद्धालु बड़ी और ज्यादा से ज्यादा संख्या में आए यह तो सरकार और व्यवसाई सभी चाहते हैं लेकिन वह रहेंगे कहां और खाएंगे क्या, इसके बारे में किसी को भी चिंता नहीं है। यात्रियों की संख्या जितनी ज्यादा होगी उनसे हर वस्तु और सेवा की कीमत उतनी ही अधिक वसूली जा सकेगी इस सोच के साथ काम करने वाली सरकार और व्यवसाई दोनों ही राज्य की छवि को खराब कर रहे हैं और इन अव्यवस्थाओं के कारण यात्री परेशान हो रहे हैं। राज्य बनने के 22 साल बाद भी चार धाम यात्रा की व्यवस्थाओं में कितना सुधार हुआ है? इस सवाल का जवाब ढूंढा जाए और इसमें से सिर्फ ऑल वेदर रोड को हटा दिया जाए जो केंद्रीय योजना के अंतर्गत आती है तो बाकी सिर्फ शुन्य ही बचता है। यात्रियों के लिए इन 20 सालों में न आवासीय सुविधाओं में कोई सुधार आया है और न दूसरी जन सुविधाएं बेहतर हुई है। और इन अव्यवस्थाओं के पीछे नोट की राजनीति और निजी हित ही रहे हैं। अभी बीते दिनों यूपी के सीएम योगी उत्तराखंड की सरकार व सीएम को चार धाम यात्रा को लेकर तमाम नसीहतें देकर गए थे लेकिन सूबे की सरकार व अधिकारियों पर किसी बात का कोई प्रभाव दिखाई नहीं देता है। उत्तराखंड और देव भूमि की पहचान चार धाम यात्रा को सुचारू बनाने के लिए अब तक की सरकारों ने कुछ किया होता तो राज्य के विकास के लिए उसे शायद कुछ और करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। योगी ने धामी के सामने अयोध्या के विकास मॉडल का उदाहरण रखा था। यह सच है कि इस छोटे से राज्य में चार धाम के साथ अगर चार अन्य धार्मिक स्थलों को भी विकसित कर लिया गया होता तो राज्य की बेरोजगारी और पलायन जैसी समस्याओं का स्वतः ही समापन हो गया होता। ठेके पर बसे चल रही है जो यात्रियों से मनमाना किराया वसूल रही है। यात्रा मार्गाे पर पेट्रोल—डीजल तक उपलब्ध नहीं है। जो सामान्य सा खाना 50 रूपये में कहीं भी मिल सकता है वह 500 में मिल रहा है यात्री कड़ाके की सर्दी में खुले आसमान के नीचे राते बिता रहे हैं और अपनी जान गंवा रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर एक टेबलेट भी समय पर मिल पाना मुश्किल है। सवाल यह है कि क्या सिर्फ कहने भर से यात्रा सुलभ और सुरक्षित हो सकती है सत्ता में बैठे नेताओं को इस पर सोचने की जरूरत है। सरकार को श्रद्धालुओं की जान से खिलवाड़ करने का कोई हक नहीं है।

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