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सरकार और विपक्ष से सवाल

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देश में इस समय यदि कोई ऐसा मुद्दा है, जिसने करोड़ों युवाओं के धैर्य, मेहनत और भविष्य को सबसे अधिक चोट पहुंचाई है, तो वह हैकृपेपर लीक। भर्ती परीक्षाओं का प्रश्नपत्र लीक होना अब अपवाद नहीं, बल्कि एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनता जा रहा है। हर बार लाखों अभ्यर्थी महीनों और वर्षों की तैयारी के बाद परीक्षा केंद्र तक पहुंचते हैं, लेकिन कुछ घंटों बाद उन्हें यह सुनने को मिलता है कि परीक्षा रद्द कर दी गई है। कारण पेपर लीक। यह केवल परीक्षा रद्द होने की खबर नहीं होती, बल्कि लाखों युवाओं के सपनों पर लगी रोक होती है। इसी बीच देश में दो समानांतर तस्वीरें दिखाई देती हैं। दिल्ली में शिक्षाविद सोनम पेपर लीक के खिलाफ अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे हैं। उनका कहना है कि यह किसी एक परीक्षा या एक राज्य का मामला नहीं, बल्कि देश की परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का संकट है। दूसरी ओर, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी छात्रों की गूंज कार्यक्रम के माध्यम से छात्रों से संवाद कर रहे हैं। वह बेरोजगारी, परीक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य पर सरकार से सवाल पूछ रहे हैं। दोनों घटनाओं का केंद्र एक ही है छात्र। लेकिन एक सवाल लगातार उठ रहा है। यदि पेपर लीक आज देश का सबसे बड़ा छात्र मुद्दा है, तो क्या विपक्ष के सबसे बड़े नेता को सड़क पर चल रहे ऐसे आंदोलनों के साथ भी प्रत्यक्ष रूप से खड़ा दिखाई देना चाहिए? क्या संसद में उठाई गई आवाज और धरने पर बैठे लोगों के बीच कोई पुल बनना चाहिए? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि लोकतंत्र में केवल सरकार ही जवाबदेह नहीं होती। विपक्ष भी जनता की उम्मीदों का प्रतिनिधि होता है। जब विपक्ष सरकार से जवाब मांगता है, तब जनता विपक्ष से भी यह पूछने का अधिकार रखती है कि वह स्वयं इस संघर्ष में कितनी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। हालांकि, यह भी उतना ही सही है कि किसी भी जन आंदोलन का महत्व केवल इस बात से तय नहीं किया जा सकता कि उसमें कौन-सा बड़ा नेता शामिल हुआ और कौन नहीं। लोकतांत्रिक समर्थन कई रूपों में व्यक्त किया जा सकता हैकृसंसद में बहस, सार्वजनिक बयान, नीति सुझाव या प्रत्यक्ष भागीदारी के माध्यम से। इसलिए केवल किसी मंच पर उपस्थित न होने से किसी नेता की प्रतिबद्धता पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। फिर भी राजनीति में प्रतीकों का अपना महत्व होता है। किसी बड़े नेता की उपस्थिति किसी आंदोलन को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला सकती है। इसलिए यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या छात्र आंदोलन केवल चुनावी भाषणों का विषय रहेंगे, या राजनीतिक दल उनके संघर्षों के साथ भी निरंतर खड़े दिखाई देंगे। पेपर लीक अब किसी एक राज्य की समस्या नहीं है। उत्तराखंड से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा और अन्य राज्यों तक अनेक भर्ती परीक्षाएं विवादों में रही हैं। इससे युवाओं के मन में यह धारणा गहराती है कि उनकी मेहनत से अधिक मजबूत पेपर लीक का नेटवर्क है। सबसे बड़ा संकट यही है कि अब छात्रों का गुस्सा केवल सरकार के खिलाफ नहीं है। वह पूरी राजनीतिक व्यवस्था से सवाल पूछ रहा है। युवा पूछ रहा है जब हमारा भविष्य दांव पर था, तब सत्ता क्या कर रही थी? और साथ ही यह भी पूछ रहा हैकृजब हम सड़क पर संघर्ष कर रहे थे, तब विपक्ष कहां था? यह लोकतंत्र का स्वस्थ संकेत है कि सवाल सभी से पूछे जाएं सत्ता से भी और विपक्ष से भी। क्योंकि युवाओं का भविष्य किसी दल का चुनावी घोषणापत्र नहीं, बल्कि राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी है। आज आवश्यकता आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि ऐसी परीक्षा व्यवस्था की है जिसमें प्रश्नपत्र बाजार की वस्तु न बने, भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी हो और दोषियों को त्वरित एवं कठोर दंड मिले। क्योंकि हर बार जब कोई पेपर लीक होता है, तब केवल प्रश्नपत्र नहीं लीक होता देश के युवाओं का विश्वास भी लीक होता है और जिस दिन यह विश्वास पूरी तरह टूट गया, उस दिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होगी।

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