उत्तराखंड में हरेला केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति आस्था, पर्यावरण संरक्षण और लोकसंस्कृति का जीवंत दर्शन है। यह वह पर्व है, जो हमें बताता है कि धरती मां है, पेड़ जीवन हैं और हरियाली ही समृ(ि की असली पहचान है। लेकिन विडंबना देखिए, जिस देवभूमि में हरेला के दिन हर घर में हरियाली का आशीर्वाद बांटा जाता है, उसी देवभूमि में हजारों पेड़ों पर विकास के नाम पर आरी भी चल रही है। यही सबसे बड़ा विरोधाभास है। एक ओर सरकारें हरेला महोत्सव मनाने की तैयारियों में जुटी हैं, लाखों पौधे लगाने के लक्ष्य घोषित किए जा रहे हैं एक पेड़ मां के नाम का संदेश दिया जा रहा है, तो दूसरी ओर ऋषिकेश-देहरादून जैसे महत्वपूर्ण मार्गों पर वर्षों पुराने वृक्ष धराशायी हो रहे हैं। सवाल यह है कि क्या हरियाली केवल भाषणों और फोटो तक सीमित रह गई है? हरेला का संदेश कभी केवल पौधे लगाने का नहीं था। पहाड़ के बुजुर्गों ने हमेशा कहा कि पेड़ लगाओ ही नहीं, उसे पुत्र की तरह पालो। लेकिन आज वृक्षारोपण एक सरकारी कार्यक्रम बनकर रह गया है। पौधे लगते हैं, तस्वीरें खिंचती हैं, आंकड़े जारी होते हैं और कुछ महीनों बाद अधिकांश पौधे सूख जाते हैं। फिर अगले वर्ष नया लक्ष्य तय हो जाता है। पर्यावरण संरक्षण यदि केवल आंकड़ों का खेल बन जाए तो प्रकृति का संतुलन कैसे बचेगा? उत्तराखंड की संस्कृति ने सदियों पहले पर्यावरण संरक्षण का ऐसा माडल विकसित किया था, जिसे आज पूरी दुनिया अपनाने की बात कर रही है। यहां जंगलों को देववन कहा गया, नदियों को मां का दर्जा मिला और पहाड़ों को देवभूमि माना गया। यही कारण था कि लोग कानून के डर से नहीं, बल्कि आस्था के कारण पेड़ों की रक्षा करते थे। आज वही आस्था सरकारी फाइलों और परियोजनाओं के बीच दम तोड़ती नजर आती है। विकास आवश्यक है। सड़कें भी चाहिए, अस्पताल भी चाहिए, पर्यटन भी बढ़ना चाहिए और आधुनिक सुविधाएं भी। लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि प्रकृति हर बार सबसे बड़ी कीमत चुकाए। दुनिया के अनेक देशों ने साबित किया है कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से सड़कें भी बन सकती हैं और जंगल भी बच सकते हैं। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में तो यह और अधिक आवश्यक है। इस बार हरेला से पहले युवाओं द्वारा मनाया गया ब्लैक हरेला केवल विरोध नहीं, बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाने का प्रयास है। उनका संदेश स्पष्ट हैकृयदि एक ओर हजारों पेड़ काटे जाएंगे और दूसरी ओर कुछ पौधे लगाकर हरियाली का उत्सव मनाया जाएगा, तो यह पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि आत्मसंतोष का आयोजन होगा। आज सबसे बड़ी जरूरत प्रतिपूरक वृक्षारोपण के आंकड़े गिनने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि जो पेड़ आज खड़े हैं, वह बिना ठोस और अपरिहार्य कारण के न कटें। क्योंकि एक परिपक्व वृक्ष केवल आक्सीजन नहीं देता, वह वर्षा चक्र को प्रभावित करता है, मिट्टी को बचाता है, भूजल बढ़ाता है, पक्षियों का घर बनता है और स्थानीय जलवायु को संतुलित रखता है। उसकी भरपाई वर्षों तक संभव नहीं होती। हरेला हमें केवल हरियाली का उत्सव मनाना नहीं सिखाता, बल्कि प्रकृति के साथ जीना सिखाता है। यह पर्व बताता है कि धरती से जितना लो, उससे अधिक लौटाने का प्रयास करो। दुर्भाग्य यह है कि आधुनिक समाज लेने में तो आगे है, लौटाने में पीछे। आज उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि इस हरेला पर कितने पौधे लगाए जाएंगे। असली प्रश्न यह है कि अगले हरेला तक कितने पेड़ बचाए जाएंगे। यदि इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर हमारे पास नहीं है, तो हरियाली के सारे दावे खोखले लगेंगे। हरेला का वास्तविक सम्मान तभी होगा, जब सरकार की नीतियों, समाज की सोच और विकास की योजनाओं में प्रकृति सबसे ऊपर होगी। अन्यथा हरेला केवल कैलेंडर का एक पर्व रह जाएगा और हरियाली धीरे-धीरे इतिहास की किताबों का विषय बन जाएगी।




