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लोकतंत्र की ताकत

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उत्तराखंड में भी एसआईआर को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। सत्ता पक्ष इसे मतदाता सूची को स्वच्छ और निष्पक्ष बनाने का अभियान बता रहा है, जबकि विपक्ष का आरोप है कि इसके बहाने कुछ वर्गों के मतदाताओं को सूची से बाहर करने की आशंका पैदा की जा रही है। अब जब 19 लाख मतदाताओं को नोटिस भेजने की बात सामने आई है, तो यह चिंता और बढ़ गई है कि कहीं तकनीकी त्रुटियों के नाम पर पात्र नागरिकों को अनावश्यक परेशानी न झेलनी पड़े। यदि नोटिस का प्रारूप स्पष्ट नहीं हुआ, जवाब देने की प्रक्रिया सरल नहीं रखी गई और दस्तावेजों की सूची अत्यधिक जटिल हुई, तो इसका सीधा असर मताधिकार पर पड़ सकता है। उत्तराखंड जैसे सीमावर्ती राज्य में मतदाता सूची का महत्व और भी बढ़ जाता है। यहां लगातार पलायन, रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में आवाजाही, सैनिक परिवारों की विशेष परिस्थितियां और तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्र मतदाता सूची को जटिल बनाते हैं। ऐसे में पुनरीक्षण आवश्यक है, लेकिन इसकी प्रक्रिया इतनी सरल और पारदर्शी होनी चाहिए कि किसी पात्र नागरिक का नाम केवल तकनीकी कारणों से न कटे। नोटिस पाने वाले मतदाताओं को पहचान, निवास, आयु और पात्रता से जुड़े वैध दस्तावेजों के साथ अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसकी निष्पक्षता पर लोकतंत्र टिका है। इसलिए आयोग की हर कार्रवाई ऐसी होनी चाहिए, जिस पर किसी भी दल या मतदाता को संदेह न हो। यदि किसी नागरिक का नाम हटाया जाता है तो उसके पीछे स्पष्ट कारण हो, समय पर सूचना मिले और उसे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर भी मिले। लोकतंत्र में मताधिकार केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक शक्ति है। 19 लाख मतदाताओं को नोटिस देने जैसी बड़ी कार्रवाई तभी विश्वसनीय मानी जाएगी, जब उसमें पारदर्शिता, समयबद्धता और मानवीय संवेदनशीलता तीनों मौजूद हों। राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। यदि किसी प्रक्रिया में वास्तविक खामी है तो उसे तथ्यों और प्रमाणों के साथ सामने लाया जाए। लेकिन यदि बिना पर्याप्त आधार के हर प्रशासनिक कदम को राजनीतिक साजिश बताया जाएगा, तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा कमजोर होगा। दूसरी ओर, सरकार और प्रशासन को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि पूरी प्रक्रिया किसी भी प्रकार के पक्षपात के आरोप से परे दिखाई दे। नोटिस, जवाब और दस्तावेजों की पूरी व्यवस्था इतनी स्पष्ट हो कि आम मतदाता को यह न लगे कि उसके अधिकार पर अनावश्यक बोझ डाला जा रहा है। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट सुनाई देने लगी है। ऐसे समय में मतदाता सूची का हर संशोधन राजनीतिक चश्मे से देखा जाएगा। इसलिए चुनाव आयोग, प्रशासन और सभी राजनीतिक दलों को अतिरिक्त संवेदनशीलता के साथ काम करना होगा। किसी भी पात्र मतदाता का नाम सूची से बाहर होना लोकतंत्र की हार होगी, वहीं किसी अपात्र व्यक्ति का नाम सूची में बने रहना चुनावी शुचिता पर प्रश्नचिह्न लगाएगा। 19 लाख मतदाताओं को नोटिस भेजने की प्रक्रिया यदि सही ढंग से नहीं संभाली गई, तो यह शुद्धिकरण अभियान भरोसे के संकट में बदल सकता है। लोकतंत्र की मजबूती मतदाता सूची की शु(ता से ही नहीं, बल्कि उस शु(ता पर जनता के विश्वास से भी तय होती है। एसआईआर की सफलता इसी कसौटी पर परखी जाएगी कि हर पात्र मतदाता निश्चिंत होकर कह सके मेरा वोट सुरक्षित है, मेरा अधिकार सुरक्षित है।

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