राम मंदिर करोड़ों भारतीयों की आस्था का प्रतीक है। यह केवल एक भव्य मंदिर नहीं, बल्कि दशकों के सामाजिक, सांस्कृतिक और न्यायिक संघर्ष का परिणाम भी है। ऐसे में यदि इस मंदिर में श्र(ालुओं के चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर सवाल उठते हैं, तो मामला किसी सामान्य प्रशासनिक विवाद तक सीमित नहीं रहता। यह सीधे उस विश्वास से जुड़ जाता है, जिसके सहारे श्र(ालु अपनी मेहनत की कमाई का अंश भगवान के चरणों में अर्पित करते हैं। भारत में यह प्रवृत्ति नई नहीं है कि किसी भी संस्थान में विवाद होते ही सबसे पहले चेहरे बदल दिए जाते हैं। इससे तत्काल राजनीतिक और सामाजिक दबाव कुछ समय के लिए कम जरूर हो जाता है, लेकिन यदि संस्थागत सुधार नहीं किए जाते, तो वही समस्याएं फिर लौट आती हैं। सवाल व्यक्तियों का कम और व्यवस्था का अधिक होता है। आखिर ऐसी परिस्थितियां पैदा ही क्यों होती हैं, जहां आस्था से जुड़े संस्थानों की कार्यप्रणाली पर उंगली उठने लगे? राम मंदिर का महत्व इसलिए भी अलग है क्योंकि यह केवल उत्तर प्रदेश या अयोध्या तक सीमित नहीं है। देश के कोने-कोने से श्र(ालु यहां पहुंचते हैं। विदेशों में बसे भारतीय भी अपनी श्र(ा के अनुसार दान भेजते हैं। ऐसे में चढ़ावे का प्रत्येक रुपया केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के विश्वास की अभिव्यक्ति है। इस विश्वास की रक्षा करना ट्रस्ट की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। इस्तीफा किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नैतिक उत्तरदायित्व का प्रतीक माना जाता है। लेकिन इस्तीफा स्वयं में समाधान नहीं होता। समाधान तब होता है, जब उस घटना से सबक लेकर पूरी व्यवस्था को अधिक मजबूत बनाया जाए। यदि निगरानी प्रणाली कमजोर रही, यदि लेखा-जोखा पारदर्शी नहीं रहा, यदि जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण नहीं हुआ, तो नए पदाधिकारी भी उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाएंगे, जिसने पहले विवाद को जन्म दिया था। आज देश डिजिटल युग में प्रवेश कर चुका है। बैंकिंग से लेकर रेलवे टिकट, आयकर से लेकर सरकारी भुगतान तक अधिकांश व्यवस्थाएं तकनीक आधारित हो चुकी हैं। फिर धार्मिक संस्थानों में करोड़ों रुपये के चढ़ावे का प्रबंधन भी उसी स्तर की तकनीकी पारदर्शिता से क्यों न जुड़ा हो? प्रत्येक दान की डिजिटल प्रविष्टि, बहु-स्तरीय निगरानी, उच्च गुणवत्ता वाले सीसीटीवी, स्वतंत्र वित्तीय आडिट और समय-समय पर सार्वजनिक लेखा-जोखा अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता हैं। इससे न केवल अनियमितताओं की संभावना घटेगी, बल्कि श्र(ालुओं का भरोसा भी मजबूत होगा। देश के अनेक बड़े मंदिरों में अब आधुनिक प्रबंधन प्रणाली अपनाई जा रही है। दान पेटियों की इलेक्ट्रानिक निगरानी, आनलाइन दान का विस्तृत रिकार्ड, स्वतंत्र आडिट और समय-समय पर सार्वजनिक वित्तीय रिपोर्ट जैसी व्यवस्थाएं विश्वास बढ़ाने का काम करती हैं। राम मंदिर जैसा राष्ट्रीय महत्व का संस्थान इन मानकों से पीछे नहीं रह सकता। बल्कि उसे देश के अन्य धार्मिक संस्थानों के लिए आदर्श स्थापित करना चाहिए। इतिहास यह बताता है कि संस्थान व्यक्तियों से नहीं, व्यवस्थाओं से मजबूत होते हैं और यदि व्यवस्था नहीं बदली, तो आज के इस्तीफे कल की नई नियुक्तियों में बदल जाएंगे, लेकिन कुछ समय बाद फिर कोई नया विवाद सामने होगा। तब देश एक बार फिर वही प्रश्न पूछेगाकृक्या सचमुच सुधार हुआ, या केवल चेहरे बदल दिए गए?




