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देवभूमि की विकृत होती संस्कृति

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इन दिनों सूबे के एक पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत का वीडियो सोशल मीडिया पर सुर्खियों में है। जिसमें राज्य गठन के बाद राज्य के बदले परिवेश और देवभूमि कहे जाने वाली इस राज्य की सभ्यता और संस्कृति में आई विकृतियों का दर्द झलकता दिखाई देता है। वह राज्य में राजनीति और समाज के चाल चरित्र में आई भारी गिरावट पर गंभीर चिंता जाहिर करते हुए कह रहे हैं कि अब देवभूमि देवभूमि नहीं रही है साथ ही वह यह सवाल उठाते हुए कहते हैं कि क्या इसलिए प्रदेश के लोगों ने अलग राज्य बनाने के लिए संघर्ष किया? वह इसके लिए प्रदेश के नेताओं और आम लोगों को दोषी ठहराते हुए कहते हैं कि हम कहते हैं कि इसके लिए यह जिम्मेवार है वह जिम्मेवार है लेकिन हम फिर उन्हीं नेताओं को चुनकर भेजते हैं और वह मजे करते हैं उनकी चिंता के मुख्य बिंदुओं में राज्य के युवाओं में बढ़ती नशावर्ती और ड्रग्स का कारोबार तथा बढ़ती अपराधिक घटनाएं हैं जिनके कारण राज्य का पूरा समाज बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है कि राज्य गठन के 25—26 सालों में राज्य में राजनीति की विचारधारा और सामाजिक सोच में बड़ा भारी परिवर्तन आया है तथा इस परिवर्तन को कतई भी सकारात्मक या यूं कहे कि पहाड़ की मूल संस्कृति के अनुरूप और अनुकूल तो कतई भी नहीं कहा जा सकता है। राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देने की अंधी दौड़ में राज्य की सरकारों ने कभी इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि इसकी आड़ में कौन—कौन सी बुराइयां पहाड़ के शीर्ष तक पहुंच रही है। बाहर से आने वाले लोगों ने राज्य में राज्य के ही लोगों के सहयोग से ड्रग्स सप्लाई का धंधा शुरू किया जो आज राज्य के स्कूल—कॉलेज और छात्रावासों तक अपनी आसान पैठ बना चुका है। राज्य के युवा इस ड्रग्स के मकड़जाल में ऐसे फंस चुके हैं कि ड्रग्स को पैसा कमाने का आसान धंधा मान बैठे हैं। युवाओं का जीवन इससे तबाह हो रहा है इससे उनका कोई सरोकार नहीं है। कहा जाता है कि कोई भी एक बुराई अकेली नहीं आती है वह अपने साथ और भी कई जघन्य बुराइयों को साथ लेकर आती है। नशा और सेक्स जिन्हें एक दूसरे का पर्याय माना जाता है साथ—साथ पनपते हैं, फिर उत्तराखंड इससे अछूता कैसे रह सकता है। बाहर से ही सही खुलेपन की जो हवा बीते दो दशकों से राज्य में चल रही है उसने इन युवाओं को ड्रग्स और सेक्स के धंधे को उनकी कमाई का एक जरिया बना दिया है। राज्य सरकारों द्वारा होमस्टे जो कॉन्सेप्ट लाया गया वह स्वरोजगार के मद्देनजर था लेकिन उनकी गतिविधियों पर उसकी कभी नजर न रखने के कारण यह होमस्टे और रिजार्ट कब सेक्स और ड्रग्स के धंधो के अड्डों में तब्दील हो गए सरकार को पता ही नहीं चला और पता भी चला होगा तो उसे नजरअंदाज कर दिया गया। राज्य में बढ़ती हर अनैतिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने के मूल में पैसा ही रहा है। राज्य के हर आम आदमी की सोच जब सिर्फ आसानी से पैसा कैसे बन सकता है? इस पर आकर टिक जाती है तब स्वाभाविक रूप से किसी भी बुराई को पनपने का आसान अवसर मिल ही जाता है और बुराइयां दीर्घकाल में किसी भी क्षेत्र की मूल संस्कृति को निगल जाती हैं। तीरथ के दर्द की दवा क्या है इसका हल भी वह खुद ही देते हैं और युवाओं से मोर्चा संभालने का आह्वान करते हैं और जनता से अच्छे नेताओं को चुनकर भेजने की अपील करते हैं। लेकिन यह बीमारी तो अब ऐसी हो चुकी है कि इसका कोई कारगर उपाय मुश्किल ही संभव होगा।

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