उत्तराखंड सरकार द्वारा आखिरकार मंत्रिमंडल विस्तार की औपचारिकता को पूरा कर ही लिया गया। हम इसे औपचारिकता इसलिए कह रहे हैं कि सरकार ने अब जिन पांच मंत्रियों को कैबिनेट में शामिल किया है उन्हें सिर्फ 8—9 माह ही बामुश्किल कुछ काम करने का मौका मिल सकेगा क्योंकि सरकार के कार्यकाल को पूरा होने में ही मात्र एक साल का समय शेष बचा है। सही मायने में इन मंत्रियों को महीनों का समय तो किसी विभाग के काम को समझने के लिए चाहिए होंगे जबकि चुनाव से तीन माह पूर्व चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के बाद सरकारी कामकाज पर वैसे भी रोक लग जाती है। खैर सरकार द्वारा जिन पांच विधायकों को मंत्री पद दिए गए हैं उनके पास इतना समय तो है ही कि वह अपने—अपने चुनाव क्षेत्र में जाकर लोगों को अपने बढ़ते हुए राजनीतिक रुतबे की जानकारी दे सकेंगे और इस आशा के साथ काम करेंगे कि उन्हें 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में टिकट भी मिल सकेगा और जनता ने उन पर भरोसा जताया तो वह अगली बार सरकार में मंत्री भी बन सकेंगे। जिन विधायकों को अब मंत्री बनाया गया है उनमें हरिद्वार से मदन कौशिक, रुड़की से प्रदीप बत्रा, राजपुर से खजान दास, रुद्रप्रयाग से भारत चौधरी तथा भीमताल से राम सिंह कैड़ा शामिल है। इस इस मंत्रिमंडल विस्तार के साथ ही अब धामी सरकार का मंत्रिमंडल भी पूरा हो चुका है। यह अत्यंत ही हैरान करने वाली बात है कि 2022 में जब धामी को दोबारा से मुख्यमंत्री बनाया गया था तब उन्होंने अपने सहित कुल 9 मंत्रियों के साथ शपथ ली थी। 12 सदस्यीय राज्य के मंत्रिमंडल में तीन मंत्री पद पूरे 4 साल तक खाली पड़े रहे लेकिन सरकार इन पदों को नहीं भर पाई तथा मार्च 2023 में चंदन रामदास जो परिवहन मंत्री के पद पर आसीन थे उनका निधन हो गया जिससे इन खाली पदों की संख्या चार हो गई उनके निधन को भी 3 साल हो चुके हैं वहीं मार्च 2025 में अपने विवादित बयानों के चलते संसदीय कार्य मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल को भी अपने पद से हटा दिया गया। 12 सदस्यीय मंत्रिमंडल होने के बावजूद भी पुष्कर सिंह धामी तीन—चार साल लगभग आधे मंत्रिमंडल के साथ ही अपनी सरकार को चलाते रहे तथा सारा राजकाज सुचारू रूप से चलते रहना यह एक चमत्कार से कम नहीं है। इतने बोझ अकेले ढोने वाले सीएम धामी बधाई के पात्र हैं जिन्होंने कई क्षेत्रों में सराहनीय कार्य और फैसला किये, जिन्हें वह अक्सर अपनी जनसभाओं में गिनाते रहते हैं अतिक्रमणकारियों से 12 हजार हैक्टेयर भूमि को कब्जा मुक्त कराने का काम एक ऐसा ही उदाहरण है। हो सकता है अगर उनको पूरे मंत्रिमंडल के साथ काम करने का मौका मिलता तो और तेजी से राज्य का विकास होता। सही मायने में अब इस अत्यंत ही देरी से किए गए मंत्रिमंडल विस्तार का जनता को कोई फायदा नहीं होगा? यह मंत्रिमंडल विस्तार सिर्फ चुनावी फायदे के लिए किया गया विस्तार ही है। जो भी विधायक निष्क्रिय पड़े थे तथा उपेक्षित महसूस कर रहे थे उनमें उत्साह जरूर फूंक सकेगा। चर्चा तो दायित्वों के बंटवारे की भी हो रही है उम्मीद है कि दो—तीन दर्जन कार्यकर्ताओं को भी जल्द ही उत्तरादायित्व भी मिल ही जाएंगे जिससे संगठन की सक्रियता को बढ़ाने में मदद मिल सकेगी।




