संसद का शीतकालीन सत्र इस बार ऐतिहासिक बन चुका है। सत्ता पक्ष जो इस शीतकालीन सत्र के जरिए आगामी समय में कुछ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए एजेंडा सेट करने की जोड़—जुगाड़ में था जिसके तहत राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान पर लंबी चर्चा कराई गई थी उसमें भाजपा के एजेंडे ने ऐसा बैकफायर कर दिया कि उसके धमाके की गूंज ने भाजपा के सभी नेताओं को लाजवाब कर दिया और जब जवाब देने की बारी आई तो नेता विपक्ष राहुल गांधी द्वारा गृहमंत्री अमित शाह को सार्वजनिक मंच पर मीडिया के सामने खुली बहस की चुनौती दी गई तो वह अपना आपा इस कदर खो बैठे कि संसद में ही गाली—गलौज पर उतर आए तथा जोर—जोर से चीखने लगे कि राहुल गांधी यह तय नहीं करेंगे कि मुझे क्या बोलना है यह मैं खुद तय करूंगा। संसद में चल रही इस गर्मा—गर्मी के कई अहम कारण रहे हैं। भले ही संसद में बहस का मुद्दा राष्ट्रगीत रहा हो लेकिन विपक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन आरोपों को जिनके जरिए प्रधानमंत्री कांग्रेस और नेहरू को राष्ट्र विरोधी और विभाजनकारी सोच रखने तथा मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वाली पार्टी साबित करना चाहते थे उस पर जब विपक्ष के नेताओं ने इतिहास के पन्ने उलटने शुरू किया तो हंगामा खड़ा हो गया क्योंकि विपक्ष ने इसके लपेटे में संघ से लेकर उस हिंदू महासभा और भाजपा के आदर्श महापुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी तक किसी को नहीं छोड़ा। सत्ता पक्ष के नेताओं ने कल्पना भी नहीं की थी कि विपक्ष के नेता ऐतिहासिक तथ्यों के बारे में इतनी बड़ी तैयारी करके इस चर्चा के लिए आए हैं वह उनके सभी तर्कों और वितर्कों की ऐसी धज्जियंा उड़ा देंगे वह न तो अपना बचाव कर सकेंगे और न संघ और न अपने महापुरुषों को भी नहीं बचा सकेंगे। प्रियंका गांधी द्वारा इस चर्चा के दौरान दिए गए वक्तव्यों की इतनी चर्चा रही कि लोग उन्हें इंदिरा का दूसरा अवतार तक बताने लगे। आप के नेता संजय सिंह को जिन लोगों ने सुना होगा वह यह नहीं भूल सकते कि संसद में खड़े होकर उन्होंने किस तरह भाजपा और संघ को ललकारा और कहा कि आप अपने चार पूर्वजों के नाम बता दो जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कभी राष्ट्रगीत गाया हो या जेल गए हो फांसी के फंदे पर चढ़ना तो बहुत दूर की बात है। विपक्ष के नेता यही नहीं रुके उन्होंने संघ और हिंदू महासभा के सदस्यों पर नाम लेकर देश के खिलाफ अंग्रेजों के लिए मुखबारी करने तक के तथ्य पेश कर डाले गए। उन्होंने संघ द्वारा राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान का ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय ध्वज का भी कभी सम्मान न करने के मुद्दे पर वह सब कुछ कहा जो कहा जा सकता था। विपक्ष के नेताओं ने राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के लेखकों का अपमान करने का सीधा आरोप भाजपा तथा संघ के नेताओं पर लगाते हुए साफ किया गया कि आप किस राष्ट्रवाद और राष्ट्रगीत की बात करते हैं इसका आपको कोई अधिकार ही नहीं है क्योंकि आपने कभी इस देश के लिए कुछ किया ही नहीं है। आप तो सिर्फ चुनाव के लिए बने हैं और हम इस देश के लिए। इस बड़े हमले का जवाब किसी भी भाजपा के नेता के पास था ही नहीं। इसलिए मोदी के बाद जब शाह चुनाव सुधारो पर बोलने के लिए आए तो वह चुनाव आयोग को ही गालियां देते दिखे। राहुल गांधी ने उन्हें खुली बहस करने की चुनौती दी तो वह गुस्से से इस कदर लाल पीले हो गए कि देखने वाले भी उनके इस तरह के आचरण पर हैरान रह गए। भले ही चुनाव पर चुनाव जीतने के कारण भाजपा और उसके नेताओं का अहंकार इस कदर सर चढ़कर बोल रहा है कि वह यह माने बैठे हैं कि सत्ता में वह है तो वह तय करेंगे सब कुछ। कौन चुनाव जीतेगा और संसद में कौन क्या बोलेगा तक, लेकिन इन नेताओं को यह भी समझ लेना चाहिए कि सत्ता में वह सदैव नहीं रह सकते हैं।


