वंदे मातरम पर चर्चा क्यों?

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आपदा को भी अवसर में तब्दील करने का हुनर रखने वाले भाजपा के नेता और सरकार आज अपने इस फैसले पर अपना सर जरूर धुन रहे होंगे जिन्होंने पश्चिम बंगाल के चुनाव से ऐन पूर्व संसद में वंदे मातरम पर चर्चा का प्रस्ताव रखा था। 10 घंटे की इस चर्चा के लिए तमाम तैयारियां की गई थी, प्रधानमंत्री की संसद में एंट्री से लेकर उनके लगभग 1 घंटे के भाषण तक जिसमें उन्होंने हर संभव इस बात का प्रयास किया कि वह कांग्रेस को मुस्लिम लीग और देश की विभाजनकारी नीतियों का पोषक साबित करें। राष्ट्रीय गीत को दो हिस्सों में विभाजित करने के लिए नेहरू और कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने इसकी कल्पना भी नहीं की होगी कि उनकी यह गलती उन पर ही नहीं संघ पर इतनी भारी पड़ जाएगी कि भाजपा और संघ के इतिहास के वह सबसे काले पन्ने संसद में इस तरह से पलटे जाएंगे कि जो भारत की संसदीय कार्यवाही में आजादी के 75 साल बाद दर्ज हो जाएंगे जिन्हें आमतौर पर देश के लोगों द्वारा भुला दिया गया था। संसद में बैठे प्रधानमंत्री मोदी ने यह कभी सोचा भी नहीं होगा कि उन्हें वह सब कुछ सुनना पड़ेगा और वह कर कुछ नहीं पाएंगे। बिहार की जीत के मद में पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए एजेंडा सेट करने का दांव उन पर इस कदर भारी पड़ जाएगा जो उनके लिए अकल्पनीय ही होगा। देश के हर एक नागरिक को आज इस संसदीय चर्चा को जरूर सुनना चाहिए। पीएम मोदी तथा प्रियंका गांधी के भाषण को सुनकर कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि किसकी सोच राष्ट्रवादी है और किसकी विभाजनकारी। प्रियंका ने अपनी बात कहते हुए सदन में सिर्फ पूछा नहीं कि 150 साल बाद हम राष्ट्रीय गीत पर चर्चा क्यों कर रहे हैं यह बताया भी कि इसके पीछे क्या कारण है। उन्होंने सांफ कहा कि आपकी राजनीति सिर्फ चुनाव के लिए है और हमारे देश के लिए। हम सौ बार हार कर भी इस देश के लिए और देश की मिटृी के लिए आपसे सवाल पूछते रहेंगे और लड़ते रहेंगे। उन्होंने साफ कहा कि प्रधानमंत्री अगर राष्ट्रीय गीत पर सवाल उठा रहे हैं तो देश की उस संविधान सभा के सदस्यों का अपमान कर रहे हैं जिसमें सिर्फ नेहरु अकेले नहीं थे महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, रविंद्र नाथ टैगोर, मौलाना आजाद, डा. अंबेडकर जैसे महानायक शामिल थे, यह देश के महापुरुषों का ही नहीं संविधान का अपमान है। प्रियंका गांधी ने भरे सदन में पीएम मोदी के बारे में यह कहकर कि वह भाषण तो बहुत लाजवाब करते हैं मगर उनके भाषणों में तथ्यों के समावेश की बड़ी कमी होती है, मोदी को लाजवाब कर दिया। उन्होंने पीएम के भाषण की तथ्यात्मक खामियों को बिंदुवार गिनाकर ऐसी स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया कि जो अत्यंत ही अपमानजनक होती है। संसद में पीएम के प्रवेश पर वंदे मातरम—वंदे मातरम का शोर मचा कर मेज थपथपाने वाले भाजपा के सांसदों को तो मानो कोई सांप ही सूंघ गया हो। हालात इतनी विकराल हो गए कि आपदा में अवसर तलाशनें वालों को भागने का भी कोई रास्ता नहीं मिला और प्रियंका मोदी के 12 साल और अपने 12 महीने संसदीय अनुभव की दुहाई देकर बोलते—बोलते वहां तक पहुंच गई कि हम एक सर्व मान्य सत्य वंदे मातरम पर चर्चा की बजाय बेरोजगारी, महंगाई और पीएमओ में जो कांड हुआ है उस पर चर्चा क्यों नहीं करते? इस चर्चा में विपक्ष ने भाजपा और संघ से पूछा कि वह बताएं उन्होंने कब—कब कहां—कहां राष्ट्रीय गीत गया संघ की शाखाओं में तिरंगा न फहराने और स्वतंत्रता आंदोलन के समय देश की मुखबरी करने तक के सवाल आज संसद में न सिर्फ उठे बल्कि 75 साल का कच्चा चिट्ठा इस चर्चा के जरिए संसदीय इतिहास में दर्ज हो गया। इस चर्चा को पीएम ही नहीं बीजेपी के नेता अब क्या कभी भूल पाएंगे? भाजपा का सारा राष्ट्रवाद आज विपक्ष ने तार—तार कर डाला।

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