उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस के सांगठनिक ढांचे में कांग्रेस हाई कमान द्वारा बड़ा फेर बदल कर दिया गया है। विधानसभा चुनाव 2027 से सवा साल पहले लिए गए इस बड़े फैसले की दो बातों ने न सिर्फ प्रदेश कांग्रेस के नेताओं को हैरान कर दिया है बल्कि भाजपा के खेमे में भी हलचल पैदा कर दी है। हमेशा समय के बाद फैसला करने वाली कांग्रेस द्वारा समय से भी पूर्व लिए गए फैसले की खबर अच्छे—अच्छे कांग्रेसी नेताओं को भी नहीं लग सकी और मीडिया को इसकी भनक तक न लगी। कांग्रेस ने प्रदेश प्रभारी श्ौलजा की जगह अब इसका उत्तरदायित्व मनोज यादव को और प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा की जगह अब फिर गणेश गोदियाल को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंप दी गई है। जिन्हें इस पद से हटाकर करन माहरा को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी गई थी, वह करन माहरा से फिर अपना कार्य भार ग्रहण करेंगे। ऐसा अमूमन होता नहीं है। करन माहरा को भी पार्टी ने पैदल नहीं किया है उन्हें भी सीडब्ल्यूसी में रखा गया है। कांग्रेस ने इस बड़े बदलाव में 2027 की चुनावी जिम्मेवारियां भी किन—किन नेताओं को सौंपी जानी है यह भी तय कर दिया है। प्रीतम सिंह जो उत्तर प्रदेश के समय से कांग्रेस में तमाम छोटे बड़े पदों पर प्रभावी रहे हैं। उन्हें इस चुनाव प्रचार कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है वहीं डा. हरक सिंह जो कांग्रेस छोड़कर कभी बीजेपी में चले गए थे और फिर कांग्रेस में आ तो गये थे लेकिन उन्हें पूर्ण रूप से स्वीकार्यता नहीं दी जा रही थी, को चुनाव प्रबंधन समिति का अध्यक्ष बनाकर यह साफ कर दिया गया है कि कांग्रेस में उनकी अहमियत किसी भी नेता से कम नहीं है। हरीश रावत जो पिछले चुनाव में चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष थे अब यह जिम्मेदारी डा. हरक को सौपा जाना एक महत्वपूर्ण बात है क्योंकि हरीश रावत जैसे नेता ही उन्हें ट्टउजाडु’ बल्द जैसे शब्दों से नवाजते रहे हैं। सबसे खास बात यह है कि कांग्रेस हाई कमान द्वारा अब जो नई टीम 2027 के चुनाव के लिए घोषित की गई है उसमें किसी भी प्रभावशाली नेता को उसकी अपेक्षा से कम अहमियत नहीं दी गई है। प्रीतम सिंह से लेकर हरक सिंह और करन माहरा तक तथा आर्य से लेकर गणेश गोदयाल तक। सभी संतुष्ट हैं और अब इस फैसले का स्वागत करते हुए एक टीम की तरह एकजुट होकर कांग्रेस को जिताने के लिए काम करने की बात कर रहे हैं। एकमात्र पूर्व सीएम हरीश रावत है जिन्हें कोई जिम्मेवारी नहीं दी गई है। वह हरीश रावत अब जो कभी सभी को ढोल समझकर बजाते रहते थे। कभी प्रीतम को बड़ा नेता बता कर उनके नेतृत्व में आगे बढ़ने की बात करते थे तो कभी ब्राहमणों को तवज्जो देने की बात कर गणेश गोदयाल के कंधे पर हाथ रखते हुए देखे जा रहे थे वह अब स्वयं का ही ढोल बजाने पर मजबूर है और कह रहे हैं कि अब जैसे भी उनकी जरूरत होगी वह बजा लेंगे। खास बात यह है कि भले ही उन्हें अभी कोई पद न दिया गया हो लेकिन ढोल उनके बिना नहीं बजेगा यह मुगालता उन्हें अभी भी है। इस बड़े बदलाव से हाई कमान ने पार्टी की अंदरूनी खींचतान को समाप्त करने तथा गढ़वाल के खालीपन को भरने की भी कोशिश की है इसका कितना फायदा होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा।




