बात चाहे वोट चोरी की हो या फिर उस एसआईआर की प्रक्रिया की जो इन दिनों बिहार में जारी है। राहुल गांधी के आरोप सही है या गलत जिस भी मुद्दे पर इन दिनों पूरे देश में चर्चा हो रही है वह असल मुद्दा चुनावी निष्पक्षता का है। अगर मतदाता सूचियों में किसी तरह की गड़बड़ी है अथवा ईवीएम में गड़बड़ी है तो फिर आप निष्पक्ष चुनाव की कल्पना भला कैसे कर सकते हैं और इस बात से कोई भी इन्कार नहीं कर सकता है कि मतदाता सचियो में गड़बड़ी नहीं है। इस गड़बड़ी को चूक नहीं कहा जा सकता है। भूल चूक के कारण इतने बड़े स्तर पर गड़बड़ी नहीं हो सकती है जो मतदान के चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सके। कोई अदालत अथवा चुनाव आयोग जिसके कर्तव्य क्षेत्र में यह काम आता है इस बड़ी गलती के लिए स्वयं को दोषी माने न माने लेकिन यह अकाट्य सत्य है। बिना मतदाता सूचियों के सुधार के यह संभव ही नहीं है कि देश में निष्पक्ष चुनाव हो सके। राहुल गांधी अगर एक ही विधानसभा में एक लाख से अधिक फर्जी वोटर होने का ससबूत आरोप लगा रहे हैं तो इसे गंभीर व गंभीरता से क्यों नहीं लिया जा रहा है? यह हैरान करने वाली बात है। अगर देश के अंदर वोट चोरों और चोरी का कोई इतना बड़ा नेक्सेक्स तैयार हो गया या काम कर रहा है तो संविधान का क्या मतलब रह जाता है और लोकतंत्र का क्या औचित्य है। हास्यास्पद बात यह है कि इस अति संवेदनशील मुद्दे पर सरकार चुनाव आयोग और देश का मुख्य मीडिया डिफेंसिव मोड में काम करता दिखाई दे रहा है। इन हालातो को देखकर ऐसा लगता है कि अब नियम कानून संविधान और लोकतंत्र की बात तो छोड़िए कहीं भी नैतिकता का कोई अंश मात्र भी शेष नहीं बचा है। सत्ता, शासन—प्रशासन अगर इस कदर असंवेदनशील बन गया है तो फिर सीधा—सीधा कहो कि अब कोई लोकतंत्र नहीं तानाशाही का दौर है। जिसे स्वीकार करना है और नहीं करना है तो मरने के लिए तैयार रहो। निसंदेह किसी देश के लोकतंत्र के लिए ऐसी स्थिति अत्यंत ही चिंताजनक है। मतदाता सूचियां और मतदान की निष्पक्षता सुनिश्चित किये बिना अब इस देश का लोकतंत्र और संविधान नहीं बचाया जा सकता है। यह मुद्दा अत्यधिक गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। इसलिए देश की न्यायपालिका का उत्तरदायित्व और भी अधिक बढ़ जाता है कि इस मामले में हस्तक्षेप तो करें ही साथ ही इसे पूरी गंभीरता से ले तथा आरोपितों में दोषियों की शिनाख्त की जाए और उन्हें जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाए। यह भ्रष्टाचार की प्रकाष्ठा से जुड़ा एक ऐसा मामला है जिसमें सत्ता द्वारा समूचे तंत्र को अपने कब्जे में लेकर काम किया जा रहा है तथा इस पूरे खेल में भ्रष्टाचार के रास्ते इकट्ठा किए गए धन का इस्तेमाल किया जा रहा है। और अगर इस मामले की जड़ तक जाने का प्रयास किया जाए तो किसी की भी समझ में आसानी से यह बात आ सकती है कि इसका उपचार सिर्फ चुनावी बांण्ड के नियम कानून का असवैधानिक ठहराये जाने भर से नहीं किया जा सकता है। हर स्तर पर सत्ता के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अनवरत एक महा अभियान छेड़े जाने की जरूरत है। चुनाव में सिर्फ प्रत्याशियों के चुनावी खर्च सीमा तय किया जाना ही काफी नहीं है बल्कि काले धन के इस्तेमाल पर कड़ाई से भी रोक लगाई जाने की जरूरत है। जब तक चुनावी व्यवस्था इतनी पारदर्शी नहीं हो पाएगी कि एक सामान्य आदमी भी चुनाव लड़ सके और विधानसभा व संसद तक पहुंच सके तब तक लोकतंत्र और संविधान पर आए इस गंभीर खतरे को टाला नहीं जा सकता और इस सुधार की शुरुआत निर्वाचन आयोग से ही होनी चाहिए।




