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दून के आर्म्स डीलर भी अब शक के दायरे में!

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जांच हुई तो कई जायेंगे जेल

देहरादून। दिल्ली में दून के आर्म्स डीलर के पकडे जाने के बाद एक बडा खुलासा हुआ कि किस तरह यह आर्म्स डीलर अपने इस गोरखधंधे को अंजाम दे रहे हैं। जिसके बाद सेे दून के अन्य आर्म्स विक्रेता भी शक के दायरे में आ गये हैं। जिला प्रशासन ने अगर इनकी जांच की तो कई परीक्षित जेल में जा सकते हैं।
गौरतलब है कि गत दिवस दिल्ली पुलिस ने दून के एक आर्म्स डीलर सहित छह लोगो को 2251 कारतूसों के साथ गिरफ्तार किया। यह कारतूस गैंगस्टरों को देने के लिए ले जाये जा रहे थे। इस घटना से यह बात भी सामने आयी कि दुकान में एक कारतूस को एक सौ से डेढ सौ रूपये में बेचकर पैसे कमाने से अधिक गैगेस्टरों को बेचने में फायदा है। परीक्षित नेगी ने यह 2251 कारतूस पांच लाख रूपये में बेचे थे जिसके अनुसार एक कारतूस की कीमत लगभग 222 रूपये आती है जोकि काफी फायदे का सौदा था। यहां एक बात और सामने आयी कि परीक्षित इन कारतूसों के लिए अपने दस्तावेजों से छेडछाड कर इनको दून के ही अन्य आर्म्स डीलर को बेचना दर्शाकर इसकी स्मलिंग करता था। इस घटना के बाद दून के अन्य आर्म्स डीलर भी शक के दायरे में आ गये हैं। क्योंकि परीक्षित तो एक छोटी मछली है यहां तो उससे भी बडे आर्म्स डीलर मौजूद हैं तो फिर उनके दस्तावेजों में भी कुछ तो घालमेल हो सकता हैं। आलम यह है कि दून के कई आर्म्स डीलर आम ग्राहक को कारतूस का स्टॉक न होने के बहाने बनाते हैं और जब किसी को देना ही पड जाये तो उसके दुगने से तीन गुना दाम वसूले जाते हैं। यहां यह भी देखने को मिला है कि कोई भी आर्म्स डीलर अपने स्टॉक का डिस्प्ले नहीं करता कि उसके पास वर्तमान में कितने कारतूस पडे हैं। जबकि इसकी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की बनती है कि वह इस बात को चेक करके आर्म्स डीलर को आदेशित करे कि वह अपने यहां मौजूद कारतूसों की संख्या को डिस्प्ले करे। यहां यह भी है कि कारतूस खरीदने की एक सीमा होती है कि एक लाईसेंस धारक एक साल में मात्र बीस कारतूस ही खरीद सकता है उससे ऊपर उसको कारतूस नहीं दिये जा सकते हैं। लेकिन वहीं रसूखदार व्यक्ति एक बार में बीस से तीस कारतूस खरीदता है और उसको वह दे भी देते हैं। तो फिर वह भी अपने दस्तावेजों में हेरफेर करता ही होगा। जबकि जिलाधिकारी के यहां मौजूद अस्लाह बाबू के पास आये दिन आर्म्स डीलर अपने दस्तावेजों की जांच कराने जाते हैं तो फिर क्या अस्लाह बाबू को इनकी हेराफेरी दिखायी नहीं देती या फिर वह जानबूझकर अनदेखा कर देता हैं। इस मामले की भी जांच होनी चाहिए कि अपनी सीट में बैठे अस्लाह बाबू को इनकी हेराफेरी क्यों दिखायी नहीं देती। दिल्ली की घटना से अब दून के अन्य आर्म्स डीलरों के सिर पर भी शक की तलवार लटक गयी हैं। जिला प्रशासन अगर सही तरीके से और निष्पक्ष जांच करे तो दून में अभी कई अन्य परीक्षित सामने आ सकते हैं। अब देखना है कि जिला प्रशासन इस बात को कितनी गम्भीरता से लेता हैं। क्योंकि यह छोटा मामला नहीं है कि दून से बाहरी प्रदेशों के गैगेस्टरों को अस्लाह सप्लाई किया जा रहा है और दून पुलिस व प्रशासन इससे अनभिज्ञ है। यह दून पुलिस व प्रशासन पर भी प्रश्न चिन्ह लगाता है।

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